पृष्ठ:देव और बिहारी.djvu/१३४

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१४० देव और विहारी नाओं को अनादर-पान समझे, तो समझा करे; परंतु संसार ने न अब तक ऐसा समझा है ओर न भविष्य में उसके ऐसा समझने का भय है।xx देखना तो यह चाहिए कि जो विषय कवि ने उठाया है, उसमें वह कहाँ तक कृतकार्य हुआ है । विषय की उत्त- मता भी साहित्य की उत्तमता का एक कारण है, पर वहीं उसका", एकमात्र कारण नहीं है। उत्तम-से-उत्तम विषय पर भी अधम रचना बन सकती है और ख़राब-से-खराब विषय पर हृदय-ग्राहिणी कविता की जा सकती है । कालिदास, व्यास भगवान्, सूरदास, शेक्सपियर आदि ने बहुत-सी शृंगारिक कविताएँ की हैं. परंतु फिर भी उनकी रचनाओं के वे भाग अब तक निंद्य नहीं समझे गए। सूर- दास ने कई स्थानों पर विस्तारपूर्वक सुरति तक का वर्णन किया है, परंतु वह भाग भी अद्यावधि सरसागर से निकाल नहीं डाले गए। सूरसागर का बहुत बड़ा भाग श्रृंगार की कविताओं से ही भरा है।" पर उन्हीं काव्य-मर्मज्ञ सरस्वती-संपादक ने भी यह स्वीकार किया है कि "देवजी के अच्छे कवि होने में कोई भी संदेह नहीं।" कालिदास, भिखारीदास, सूदन, बलदेव, ब्रजराज, श्रीधर पाठक, भान, पं० अयोध्याप्रसाद वाजपेयी, सेवक, भारतेंदु बाबू हरिश्चंद्र, पं० बदरीनारायण चौधरी एवं रखाकरजी की राय में भी देवी बहुत अच्छे कवि है।

  • कभी-कभी कवि विशेष के अपूर्व भाव पर दूसरा ककि लोट-पोट

हो जाता है यदि आवश्यकता पड़ती है और भाव-हरण करना अभीष्ट होता है, तो वह कवि उसी कवि विशेष का भाव अपनाने का उद्योग करता है। इससे पूर्ववर्ती कवि के रचना-कौशल का महत्त्व प्रतिपादित होता है। विहारीलाल के पूर्ववर्ती अनेक कवियों ने उनके भान लिए हैं। विहारीलाल के लिये यह गोरव की बात है। संजोवन-भाष्य (सतसई ) में ऐसे अनेक उद हरण मिलेंगे।