यह पृष्ठ अभी शोधित नहीं है।
१५६
देव-सुधा
 


पहले ही प्रलय-समान दिन को प्राण क्योंकर रहेंगे (और यदि किसी भाँति रहे भी), तो दूसरे दिन की दशा दुख-मूल के समान होगी । अंतिम दोनो पद उत्कृष्ट हैं। खरी दुपहरी हरी भरी फरी कुज मंजु , गुज अलि-पुजनि की देव हियो हरि जाति ; सीरे नद-नीर तरु सीतल गहीर छाँह , सोवै परे पथिक पुकारें पिकी करि जाति । ऐसे मैं किसोरी भोरी कोरी कुम्हिलाने मुख पंकज से पाय धरा धीरज सों धरि जाति ; सौंहे घाम स्याम मग हेरति हथेरी प्रोट, ___ऊँचे धाम बाम चढ़ि आवति उतरि जाति ॥ २४३॥ उत्कंठिता नायिका का वर्णन है । गहीर = गंभीर; धनी । कोरी = अछूती । सौंहे = सामने । मग हेरति - मार्ग की प्रतीक्षा करती है। हथेरी भोट = हाथ की आड़ । दूर तक देखने को या सूर्य की किरण बचाने को। कैधौं हमारियै वार बड़ो भयो कै रबि को रथ ठौर ठयो हे* , भोर ते भान की ओर चितौति घरी पल हू गनतौ न गयो है ; श्रावत छोर नहीं छिन का दिन को नहिं तासरो याम छयो है , पाइए कैसेक साँझ तुरंतहि देखु री दौस दुरंत भयो है ॥२४४॥ नायिका नायक की प्रतीक्षा करती है। बार = बारी - उसरी । छयो है = व्यतीत (क्षय ) हुआ है। ® या तो ( दिन । मेरी ही बारी में बड़ा हो गया है, या सूर्य का रथ एक ही स्थान पर रुक गया है।