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देव-सुधा
 

१४८ देव-सुधा केती न नागरि नौल-बधू तुम ही गुन-आगरि आई न गौने , देव सकोचनि सोचति क्यों मृग-लोचनि लोचनिकै ललचौने पी को पियूष सखी सुर-रूख ते दूखत सूखत या मुख मौने मान के मंदर रूप-समुदर इदु ते सुदर सील सलौने ।। नौल = नवल = नवीन । बैठी कहा धरि मौन भटू रंगभौन तुम्हें बिन लागत सूनौ , चातक लौं तुमहीं ररि देव चकोर भयो चिनगी करि चूनौ ; साँझ सुहाग की माँझ उदौ करि सौति सरोजन को बन लूनौ, पावस ते उठि कीजिए चत अमावस से उठि कीजिए पूनौ ।। दूती नायिका को शिक्षा देती है। चूनौ = चुगाकर।

  • हे मृगनयनी ! तू ललचवाने के योग्य नेत्रवाली होकरभी

संकोचों से क्यों सोचती है ? + हे सखी, इदु ते सुंदर, रूप-समुंदर, सील सलोने, सुर-रूख पी को पियूष ( अमृत-सा प्रेम ) मान के मंदर या मुख मौने ते सूखत (अथच ) दूखत । प्रयोजन यह है कि अल्पवृक्ष के समान एवं रूप के समुद्र पति का भी प्रेम तेरे मंदराचल-समान भारी गानभव मौन से सूखता एवं दूषित होता है । सखी मान-मोचनार्थ शिक्षा देती है।

  • पावस' से नायक के रोने से तथा 'चैत' से उसके प्रफुल्लित

होने से अभिप्राय है। ___ सखी नायिका को नायक के पास जाने के लिये उजित करती है, और उसका परिणाम यह दिखाती है कि नायक तुम्हारे विरह में जो अश्रु-धारा गिरा रहा है, उसे प्रफुल्लित करो, और अपने मुख-चंद्र से वहाँ के अंधेरे को मिटाकर प्रकाशमय करो।