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देव-सुधा
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देव-सुधा कै वह प्यारु कै एतो कुप्यारु औ न्यारी है बैठि कै बात बनैए, प्यारे पराए सों कौन परेखो गरे परि कौलगि प्यारी कहैए । मानिनी परकीया नायिका का वर्णन है । कौलगि = कब तब । (२६) सखी की शिक्षा गौने कि चाल चली दुलही गुरु नारिन भूषन भेष बनाए , सील सयान सबै सिखएरु सबै सुख मासुरेहू के सुनाए । बोलियो बोल सदा अति कोमल जे मनभावन के मन भाए , यों सुनि ओछे उरोजनि पै अनुराग के अंकुर-से उठि आए । इंद्र ज्यों राज कुबेर ज्यों संपति त्यों दृग दोपति लाज धरे री, बालक बान दै बीरध पान दै अंजन सान दै क्यों निदरे री; गोकुल मैं कुल तो कुल पै कहँ उज्जल तो-से सुभाय भरे री, इंदु मैं अागि पियूष में ज्यों विष देव त्यों तो मुखबातकरे री। तेरा इंद्र का-सा राज्य एवं कुबेर का-सा धन-समूह है, तथा तेरे नेत्र लाज की प्रभा धारण किए हुए हैं, किंतु तू उन पर अंजन-रूपी सान ( बाढ़ि) धरकर क्यों उनका निरादर करती है । तेरा यह कर्म ऐसा है, जैसे वृद्ध का पान खाना (शृंगार करना ), या बालकों को तीर देना। गोकुल में तो कुल (बहुत-से ) कुल (वंश) हैं, किंतु तेरे समान उजले सुभाव से भरे हुए व्यक्ति कहाँ हैं ? ऐसी गुण- युक्ता जो तू है, उसके मुख से कड़ी बात का निकलना ऐसा ही है, जैसे चंद्रमा में अग्नि या अमृत में विष ।

  • हिसाब।