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बनारस


स्थान, उनकी मूर्तियां और उनके पुजारी तक जला दिये गये। अबतक सारनाथ में हड्डियाँ, लोहा, लकड़ी, राख, पत्थर जमीन में गड़े हुए मिलते हैं।

बनारस में दो पुराने ताम्र-पत्र मिले हैं। वे संवत् ११८१ और ११८५ के हैं। राजा गोबिन्दचन्द्रदेव के वे दानपत्र हैं। उनसे मालूम होता है कि कान्यकुब्ज के राजों का राज्य बनारस तक था। वे वाराणसी के भी राजा कहलाते थे। परन्तु बनारस का उस समय का इतिहास बहुत ही कम ज्ञात है। ११९३ ईसवी में मुहम्मद गोरी ने जबसे जयचन्द्र को परास्त किया तब से बनारस पर मुसलमानों का अधिकार हुआ और ६०० वर्ष तक बराबर बना रहा। उन्होंने बनारस के बड़े बड़े मन्दिरों को मसजिदों और मकबरों में परिवर्तित कर दिया और छोटों को गिरा कर उनके ईंट-पत्थर से अपने मकान और मसजिदें वग़ैरह बनवाईं। अलाउद्दीन इस बात को बड़े घमण्डसे कहता था कि सिर्फ बनारस में उसने १००० मन्दिर गिरा कर उन्हें ज़मीन के बराबर कर दिया। औरङ्गजेब ने उसका नाम मुहम्मदाबाद रक्खा और उसके नये पुराने मन्दिरों को खोद कर ख़ुदा के सब से बड़े बन्दों की फिहरिस्त में अपना नाम दर्ज कराया। यही कारण है जो दो तीन सौ वर्ष से अधिक पुरानी एक भी पूरी इमारत बनारस में विद्यमान नहीं।

आधुनिक बनारस

अठारहवें शतक में बनारस-नगर अबध के नव्वाब सफ़दरजंग के कब्जे में आया। १७३८ ईसवी में मनसाराम नामक एक पुरुष ने