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दृश्य-दर्शन

ऊँचा उठा लिया है। यह तोप १७ फुट ६ इंच लम्बी है। इसका वजन २१२ मन है । १६३७ ईसवी में इसे जनदिन नाम के कारीगर ने. ढाके में,बनाया था। इस पर कई लेख खुदे हुए हैं जिन में से सिर्फ दो पढ़े जाते हैं।

मुबारक-मंजिल मुरशिदावाद के महल से दो मील है। वहां ईस्ट इण्डिया कम्पनी के दफ्तर थे। जब दफ्तर कलकत्ते उठ गये तब नव्वाव हुमायूं जाह ने उसे दस लाख में खरीद लिया। इस इमारत के सामने काले पत्थर का एक तख्त है। सुल्तान शुजा के वक्त से बङ्गाल के नव्वाब नाज़िम इसी तख्त पर बैठते थे। बुखारा के रहने वाले ख्वाजा नज़र नाम के कारीगर ने इसे,१६४३ में,बनाया था। पलासी की लड़ाई के बाद क्लाइव ने मीरजाफ़र को मंसूर-गज में,इसी तख्त पर बिठलाया था। १७६६ में,बङ्गाल,विहार और उड़ीसा की दीवानी प्राप्त करके,क्लाइव,नजमुद्दौला के बराबर, इसी तख्त पर बिराजे थे । जब से मुरशिदाबाद के नव्वाब दीवानी का बोझ अपने सिर से उतार कर हलके हो गये,तब से उन्होंने इस तख्त पर बैठना छोड़ दिया। उस साल जब लार्ड कर्जन मुरशिदाबाद में मुबारक मंजिल देखने पधारे थे तब आपने अपने आसन से इसे कृतार्थ किया था। अब यह मुख्त कलकत्ते उठ आया है।

मोती झील महल से कोई दो मील है। प्राचीन गौड़ की गिरी हुई इमारतों से, अलवर्दी खां के दामाद, नवाजिश अहमद ने यहां पर एक मकान बनवाया। धीरे-धीरे और भी कई अच्छी अच्छी इमारतें वहां पर बन गई। एक मसजिद भी बन गई । सिराजुद्दौला की मौसी,