पृष्ठ:दुर्गेशनन्दिनी प्रथम भाग.djvu/८१

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लम्बा हो गया। शेष दो पठान जो थे उनने तीक कर जगतसिंह के मस्तक पर एक तरवार मारी परन्तु राजपूत ने जो लपक कर एक ऐसी कमर में हनी कि एक तो दो टुक हो गया दूसरे को तरवार कन्धे में लगी। रुधिर देख कर बीर को दूना रोष हुआ, जब तक पठान उबाता था जगतसिंह ने दोनों हाथों से कृपाण पकड़ ऐसे धड़ाके से मारा कि शरीर के आरपार होगई। पर लिखा है कि "मरतिहु बार कटक संहारा।' शक्ति के प्रभाव में राजकुमार भी गिर पड़े और मृतक के कमर की छुरी पेट में धंस गई, पर उसका कुछ ध्यान न कर राजकुमार ने एक और तलवार उसके सिर में मारी, इतने में बहुत से सिपाही अल्ला अल्ला करते आन पहुंचे राजपुत्र ने देखा कि अब लड़ना केवल प्राण देना है। शरीर से रुधिर बह रहा था और कुछ सुस्ती भी आगई थी।

तिलोत्तमा को अभीतक चेत नही हुआ था, विमला उसको गोदी में लिये इधर उधर कूदती थी और उसके भी वस्त्र में रुधिर लगाथा।

राजकुमार उसके उपर भार देकर स्वास लेरहे थे कि एक पठान ने कहा "अरे कायर! अस्त्र छोड़ेगा कि नहीं? तेरा प्राण लूंगा।"

अप्रतिष्ठित शब्द सुन कर युवराज को और रोष हुआ ओर कूद कर उसके ऊपर चढ़ बैठे और तरवार उठाय कर बोले, "दुष्ट? देख राजपूत ऐसे प्राण त्याग करते हैं।"

राजपूत्र ने जब देखा कि अकेला युद्ध करना उचित नहीं इस से तो मर जाना अच्छा है तो शत्रुदल में घुस कर दोनों हाथों से तरवार भांजने लगे. शरीर का ध्यान कुछ भी न रहा, एक दो तीन पठान हर हाथ में गिरते थे और कितने