पृष्ठ:दुर्गेशनन्दिनी प्रथम भाग.djvu/६७

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आती हूं और वहां से चली गई।

थोड़ी देर में एक दूसरी कोठरी का द्वार खुला और बिमला राजकुमार को पुकार कर कहने लगी "यहां आकर एक बात सुनिये।

युवराज का हृदय और भी कांपने लगा और उठकर उसके पास गए।

बिमला तुरन्त वहां से टर गई, राजकुमार ने देखा कि कोठरी अति उत्तम और स्वच्छ है और भीतर से सुन्दर सुगन्ध आरही है मणिमय दीप जल रहा है और घूंघट काढ़े एक स्त्री बैठी है।




सोलहवां परिच्छेद।
चातुर्य्य।

कार्य्य समापन पश्चात बिमला प्रफुल्ल बदन अपनी कोठरी में पलङ्ग पर बैठी है, दीप जल रहा है, आगे मुकुर रक्खा है देखा तो सन्ध्या को श्रृंङ्गार करके गई थी सब उसी प्रकार बना है। बाल बिखरे नहीं, आंखों के कज्जल में कुछ भेद नहीं आया, ओंठो पर धड़ी बंधी है और कान कुंडल भी वही असीम शोभा दिखा रहा है। भृङ्गी भाव से तकिया पर लेटी मूर्ति नवयुवतियों को मान हीन करती थी। इस प्रभा को आरसी में निहार बिमला मुस्किराई।

इस अवस्था में बैठी जगतसिंह की राह देख रही थी कि इतने में अमराई में तुरुही का शब्द हुआ और वह चिहुंक उठी। फाटक के अतिरिक्त अमराई इत्यादि कहीं