पृष्ठ:दुर्गेशनन्दिनी प्रथम भाग.djvu/६१

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युवराज ने कहा मैं कह तो नहीं सकता क्योंकि तुमको क्लेश बहुत होता है पर यदि तुम एक बेर और इस मन्दिर में आओ तो मैं तुम्हारा चिरवाधित हूंगा। मैं , भी कभी तुम्हारे काम आऊंगा।

बिमला बोली युवराज! मैं तो आपकी चेरी हूं किंतु अकेले इस मार्ग में भय लगता है, आज्ञा भंग करना उचित न समझ मैं आज यहां आई हूं फिर तो यहां का आना बड़ा कठिन है।

राजपुत्र चिन्ता करने लगे और फिर बोले अच्छा यदि कुछ हानि न हो तो मैं तुम्हारे संग चलूं और बाहर कहीं खड़ा रहूंगा। तुम मुझसे संदेसा कह जाना।

बिमला ने आनन्दमग्न होकर कहा "चलिए" ओर दोनों मन्दिर में से निकलने चाहते थे कि मनुष्य के चलने की आहट कान में पड़ी राजपुत्र ने विस्मित हो कर बिमला से पूछा क्या तुम्हारे संग और भी कोई है!

बिमला ने कहा नहीं तो।

रा०| फिर चलने का शब्द कैसा सुनाई देता है, मुझे डर मालूम होता है कि किसी ने हमारी बात सुन तो नहीं ली, और बाहर आकर मन्दिर के चारों ओर टहल कर देखा तो कोई दृष्टि न पड़ा।




पन्द्रहवां परिच्छेद।
बीर पञ्चमी।

दोनो शैलेश्वर को प्रणाम कर डरते हुए मान्दारणगढ़