पृष्ठ:दुर्गेशनन्दिनी प्रथम भाग.djvu/६०

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इतना सुन बिमला बोलं उठी वह मनमोहनी वीरेन्द्रसिंह की पुत्री है और मान्दारणगढ़ ग्राम में रहती है।

जगतसिंह को सांप सा डस गया और कृपाण के ऊपर टुड्डी टेक कर किञ्चित काल पर्य्यन्त सोचते रहे फिर ठंडी सांस ले कर बोले बिमला तू सत्य कहती थी। तिलोत्तमा मुझको नहीं मिल सकती, अब मैं रणक्षेत्र में जाता हूं और वहीं कट कर मर जाऊंगा।

उनकी यह अवस्था देख विमला ने कहा युवराज आप आशाभग्न न हों कहा है कि "जेहिकर जेहिपर सत्य सनेहू सो तेहि मिलै न कछु सन्देहू।" आज नहीं तो कल ईश्वर अवश्य दया प्रकाश करेगा, संसार आशा ही के स्तंभ पर स्थित है, हथेली पर सरसों नहीं जमती आप मेरी बात सुनिए और दुःख न कीजिए ईश्वर की महिमा को कौन जान सकता है। वह राई से पर्वत और पर्वत से राई बनाता है।

राजपुत्र ने आशा ग्रहण किया और कहा जो हो, अबतो मुझको कुछ भला बुरा नहीं सूझता। जो होना है सो तो हो होगा क्या ब्रह्मा का लिखा कोई मिटा सकता है? अब तो मैं इस शैलेश्वर के सन्मुख संकल्प करता हूं कि तिलोत्तमा के अतिरिक्त और कहीं किसी का पाणि ग्रहण न करूंगा। तुमसे मैं यही प्रार्थना करता हूं कि तुम जाकर यह सब बातें मेरी अपनी सखी से कह देना और यह भी कहना कि मैं एक बेर दर्शन की लालसा रखता हूं।

बिमला बहुत प्रसन्न हुई और बोली कि आपकी बात तो मैं उस्से कह दूंगी पर उस का उत्तर आप के पास कैसे पहुंचेगा!