पृष्ठ:दुर्गेशनन्दिनी प्रथम भाग.djvu/४८

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और मुंह में धर आसमानी का पैर पकड़ कर कहने लगे "मेरी प्यारी आसमानी, किसी से कहना मत तुमको हमारी सौगंध।"

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बारहवां परिच्छेद।
दिग्गज हरण।

इसी औसर पर बिमला ने आकर बाहर से द्वार खटखटाया। द्वार का शब्द सुनतेही दिग्गज का मुंह सूख गया और आसमानी ने कहा क्या हुआ? बिमला आती है छिप रहो छिप रहो।

ब्राह्मण देवता झट उठ खड़े हुए और घबरा कर कहने लगे "कहां छिपूं?"

आसमानी ने कहा देखो उस कोने में बड़ा अंधेरा है एक काली हांड़ी सिर पर रख के वहीं छिप रहो, अंधेरे में कुछ जान न पड़ैगा। दिग्गज ने वैसाही किया और आसमानी के बुद्धि को सराहने लगे किन्तु दुर्भाग्य वश एक अरहर की दाल की हांडी हाथ आई, ज्योंही उस को माथे पर औंधाया कि सब दाल वह कर नाक मुंह और संपूर्ण शरीर पर फैल गई। इतने से विमला ने भीतर आकर दिग्गज की यह दशा देखी। दिग्गज उसको देखतेही उठ खड़े हुए बिमला के मनमें दया आई और कहने लगी कि "बैठे रहो महाराज बैठे रहो" यदि तुम यह सब दाल पोंछ के खा जाओ तौ भी हम किसीसे न कहैंगी।

ब्राह्मण के जी में जी आया और फिर खाने को बैठ गये।