पृष्ठ:दुर्गेशनन्दिनी प्रथम भाग.djvu/४०

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बिमला ने भौंह चढ़ा कर कहा 'चल, वाह! अपने आप हंसती है।

आसमानी ने कहा मैं सोचती हूं कि चांद दिग्गज को तेरे संग करदूं तो अच्छा होय।

बिमला ने कहा "हां यह बात ठीक है, रसिक दासही को संग ले जाऊंगी।,,

आसमानी ने कहा "और मैं क्या हंसी करती थी?"

बिमला ने कहा "हंसी नहीं,मैं उस ब्राह्मण को पतियाती हूं और वह तो पोंगा हुई है-किन्तु वह जाय या न जाय!,, आसमानी ने हंसकर कहा वह मेरा काम है, मैं उसको अभी लिये आती हूं तब तक तू फाटकके बाहर खड़ी रह और हंसते हंसते दुर्ग के एक कुटी की ओर चली।

अभिराम स्वामी के शिष्य गजपति विद्या दिग्गज इसीमें रहते थे। इनका डोल साढ़े पांच हाथ का था, छाती हाथ भर की चौड़ी, लम्बी२ टागें, कुवड़ी पीठ और लम्बी नाके एक अद्भुत स्वरूप दिखलाती थी। माथे के बाल कुल श्वेत हो गए थे बरन टूट२ झरते भी जाते थे और वही मसल थी कि 'सौंच के पानी नाहीं नाम दयीवसिंह।' नाम तो इनका विद्या दिग्गज था परन्तु पढ़े लिखे कुछ ऐसेही थे बाल्य अवस्थामें तो व्याकर्ण प्रारम्भ किया था और साढ़े सात महीने 'महर्णोर्घ' लक्षण शुद्धता पूर्वक नहीं आया। भट्ठाचार्य्य महाशय के अनुग्रह से विद्यार्थियों में बैठ कर पन्द्रह वर्ष में शब्दकाण्ड समाप्त किया जब दूसरा काण्ड आरम्भ होने का समय आया तो गुरूजी ने कहा कि देखैं इसको कुछ आया कि नहीं और परीक्षा लेने बैठे। पूछा कि राम शब्द के परे अम होने से क्या रूप होगा। शिष्य ने देर तक सोच