पृष्ठ:दुर्गेशनन्दिनी प्रथम भाग.djvu/३६

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तिलोत्तमा ऐसा उत्तर पाय लज्जा से उदास हो गई। तब बिमला ने हंस कर कहा मैं बड़ी दूर जाऊंगी।

तिलोत्तमा फिर प्रफुल्ल बदन हो गयी और पूछने लगी कि कहां जायगी।

विमला मुंह पर हाथ रख कर हंसने लगी और बोली अनुमान करो कि मैं कहां जाऊंगी और तिलोत्तमा उसका मुंह देखने लगी तब बिमला ने उसका हाथ पकड़ लिया और 'सुनो' कह खिड़की के समीप ले गई और धीर से कान में बोली "शैलेश्वर के मन्दिर में जाऊंगी वहां एक राजपूत्र से भेंट करनी है।

तिलोत्तमा के शरीर पर रोमांच हो आया और वह चुप रही।

बिमला फिर बोली कि अभिराम स्वामी से हमसे बात हुई थी और उन्हीं ने कहा कि जगतसिंह के सङ्ग तिलोत्तमा का संयोग हो नहीं सकता, तुम्हारा बाप न मानेगा। उनसे इसकी चरचा चला कर बिना लात खाये बच जांंय तो बड़ी भाग।

तिलोत्तमा के चेहरे का रंग उतर गया और मुंह लटका कर बोली 'फिर क्या होगा?'

वि० । क्यों? मैं राजपुत्र को बचन दे आई हूं, आज रात को उनसे मिलकर सब समाचार कहूंगी। अब कुछ चिन्ता नहीं है, देखें वे फिर क्या करते हैं। यदि उनको तेरा प्रेम होगा तो-इतने में तिलोत्तमा ने कपड़े से उसका मुंह बंद कर दिया और कहने लगी "तेरी बातों के सुनने से मुझको लज्जा होती है, तेरे जहां जी में आवे तहां जा न मेरी बात और किसी से कहना न और किसी की बात मुझसे कहना"।