पृष्ठ:दुर्गेशनन्दिनी प्रथम भाग.djvu/३०

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रहा तो फिर सोचने लगी और अपने करनी पर हंसी और उस लेख को पढ़ने लगी 'वासवदत्ता' 'के' 'ई' 'इ' 'य' 'एक' 'वृक्ष' शिव 'गीतगोबिन्द' विमला, लता, पता, हिजि, बिज, गढ़, सबनाथ और क्या लिखा था ?

'कुमार जगतसिंह'

यह नाम पढ़कर लज्जा के मारे तिलोत्तमा का मुंह लाल हो गया। फिर अपने मन में सोचा कि घर में कौन है जो लज्जा करैं और दो तीन चार बेर उस नाम को धोखा और चोरों की भांति द्वार की ओर देखती थी और फिर २ उस नाम को पढ़ती थी ।

जब कुछ काल बीत गया तो मन में डरी कि कोई देख न ले और शीघ्र पानी लाकर सब को धो डाला किन्तु सन्तोष नहीं हुआ और एक कपड़े से पोंछ डाला फिर पढ़ कर देखा कि कहीं मसी का लेश तो नहीं रह गया । अभी चित्त की स्थिरता नहीं हुई और फिर पानी लाकर सब को धोया और वस्त्र से पोंछा तथापि भ्रान्ति बनी रही।




सातवां परिच्छेद।
बिमला का मंत्र ।

अभिराम स्वामी अपनी कुटी में कुशासन पर बैठे थे और विमला ने खड़े २ अपना तिलोत्तमा और जगतसिंह