पृष्ठ:दुर्गेशनन्दिनी प्रथम भाग.djvu/२७

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न्द्रसिंह को दिया जिसका आशय यह था कि एक सहस्त्र सवार और पांच सहस्त्र 'अशरफी' तुरन्त भेज दो नही तो बीस 'हजार' सेना भेजकर मान्दारणगढ़ घेर लूंगा।

पत्र पढ़कर बीरेन्द्रसिंह ने कहा "दूत !" तुम जाकर अपने स्वामी से कह दो कि सेना भेज दो मैं देख लूगा और वह सिर नीचा करके चला गया ।

विमला यह सब बातें भीतर से सुन रही थी ॥

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छठवां परिच्छेद ।
असावधानता ।

गढ़ के अग्रभाग में जिसके नीचे से दामोदर नदी बेग पूर्वक बहती थी तिलोत्तमा एक बंगले में बैठी जल का प्रवाह देख रही थी सायंकाल हो गया और पश्चिम ओर सूर्य्य अस्त होने लगे हेमवरणगन सम्मिलित नीलाम्बर का प्रतिबिम्ब बहते हुए जल में थरथराता था और उस पार की ऊंची २ अटारी और लम्बे लम्बे वृक्ष बिमल आकाश में चित्र के समान देख पड़ते थे, दुर्ग में मोर और हंस सारस आदि कोलाहल कर रहे थे और कहीं २ रात्रिकाल उपस्थित जान पक्षिगण बसेरों में चुहचुहाते थे और काननागत सुगन्धमय मंद वायु जल स्पर्श पूर्वक शरीर को छू कर शीतल करता था, उसके बेग से केश और अंचल के उड़ने की कुछ और ही शोभा थी ।

तिलोत्तमा के रूप राशि के बर्णन में लेखनी थरथराती है और उपनाम भी लज्जायुक्त होकर इधर उधर मुंह चुराते