पृष्ठ:दुर्गेशनन्दिनी प्रथम भाग.djvu/१९

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जाना चाहते हो? उसने उत्तर दिया कि हमको पन्द्रह सहस्त्र सेना चाहिये। राजा ने कहा कि यदि हम तुम को पन्द्रह सहस्त्र सिपाही देदें तो हमारे पास फिर कुछ न रह जायगा, कोई दस हजार लेकर नहीं जा सकता?

सब सेनापति चुप रहगए, अन्त को राजा का स्नेह पातृ यशवन्तसिंह नामी एक राजपूत योद्धा तैयार हुआ। राजा प्रसन्न चित्त होकर सबकी ओर देखने लगे। कुमार जगतसिंह देर से राजा के दृष्टयाभिलाषी खड़े थे ज्योंही राजा ने उनकी ओर देखा उन्होंने बिनय पूर्वक कहा कि महाराज की आज्ञा हो तो मैं केवल पांच सहस्त्रपदाति लेकर कतलूखां को सुवर्णरेखा के पार उतार आऊं।

राजा मानसिंह सनाटे में आ गए सेनापति भी सब कानाफूसी करने लगे।

थोड़ी देर के बाद राजाने कहा पुत्र मैंने जाना कि तू क्षत्री कुल तिलक होगा किन्तु अभी तुम इस काम के योग्य नहीं हो।

जगत सिंह ने हाथ जोड़ कर कहा कि यदि कार्य्य सिद्ध न हो और सेना को किसी प्रकार हानि पहुँचे तो मेरा उचित दण्ड किया जाय। राजा मानसिंह ने कुछ सोच कर कहा कि मैं तुम्हारी इच्छा को भंग न करुँगा अच्छा तुम्ही जाओ और आँखों में आँसु भर कर पुत्र को हृदय से लगाकर विदा किया और दूसरे सकल सेनापति अपने २ स्थान को चले गये।