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राजधानी तण्डा नगर में अपना मुख्य स्थान किया। समर में जाकर मानसिंह ने इस अपने प्रतिनिधि को बुलवाया और लिख भेजा कि सेना लेकर बर्द्धमान में हमको आकर मिलो।

राजा बर्द्धमान में पहुंच गए और सैयद खां ने लिख भेजा कि हमारी सेना एकतृत करने में बिलंब होगा तब तक वर्षा काल आ जायगा यदि आप वहीं पर ठहरे रहें तो मैं शरद ऋतु के आरम्भ में आपसे आकर मिलूंगा।

राजा ने दारुकेश्वर के तीर पर जहानाबाद नाम ग्राम में अपना डेरा डाल दिया और सैयदखां की राह देखने लगे। वहां के रहने वालों से मालूम हुआ कि उनकी यह दशा देख कतलूखां का साहस और भी बढ़ गया और वह जहानाबाद के समीप लूट कर रहा है।

राजा ने घबराकर उसके बल और अभिप्राय आदि का पता लगाने के लिये अपने एक प्रधान सेनाध्यक्ष को भेजना उचित समझा। राजा के साथ उनका प्रिय पुत्र जगतसिंह भी युद्ध में आया था इस दु:साध्य कार्य के भार लेने का उसकी इच्छा देख राजा ने एक सत सवार साथ करके उसीको इसका पता लगाने के निमित्त भेजा राजकुमार बहुत शीघ्र काम करके लौट आये थे उसी समय मन्दिर में पाठक लोगों से उनसे भेट हुई।।

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