पृष्ठ:दुर्गेशनन्दिनी प्रथम भाग.djvu/१४

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इस देश में पठान लोग स्वाधीन राज करते थे। निर्बुद्धि दाऊदखां ने बुरे समय में सुप्तसिंह के ऊपर हाथ उठाया और अपने कर्म के फल से अकबर के सेनापति मनाइमखां से पराजित होकर ९८२ के साल में उडिस्सा को भाग गया और बंगाल का राज मोगलियों के हाथ में आगया, पठानों ने इस नये देश में ऐसी स्थित पकड़ी कि वहां से उनको उठाना मोगलियों को बहुत कठिन होगया। अन्त को ९८६ साल में अकबर के प्रतिनिधि खांजहांखां ने उनको दूसरी बार हरा कर इस देश को भी अपने हाथ में कर लिया। इसके अनन्तर एक और बड़ा उपद्रव हुआ अकबरशाह ने राज कर प्राप्ति की जो नई प्रणाली प्रचलित की थी उससे जागीरदार बड़े अप्रसन्न हुए और सब बिगड़ खड़े हुए। यह औसर पाय उडिस्सा के पठानों ने भी सिर उठाया और कतलूखां को अपना स्वामी बना देश को स्वाधीन कर लिया। वरन मेदिनीपुर और विष्णुपुर को भी लेलिया।

आजिमखां और शहबाज़खां आदि चतुर चतुर सेनाध्यक्ष आये पर किसीने शत्रुजित देश पुनःप्राप्ति न कर पाया। अन्त को इस दुस्तर कर्म्म के साधन हेतु एक हिन्दू योद्धा भेजा गया।

जब मुसलमान की नवधर्मानुरागी सेना हिमालय के शिखर से होकर भारतभूमि में उतरे उस समय पृथ्वीराज आदि बड़े बड़े राजपूत योद्धाओं ने बड़ी शूरता से उनको रोका परन्तु विधाता को तो यही इच्छित था कि इस देश की दुर्दशा हो। राजपूत राजाओं में फूट उत्पन्न हुई और परस्पर विवाद होने लगा और मुसलमानों ने एक एक करके संपूर्ण राजाओं को जीत लिया और कुल भरतखण्ड