पृष्ठ:दुर्गेशनन्दिनी प्रथम भाग.djvu/१३

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जगतसिंह ने कुछ सोच कर कहा कि आज के पन्द्रहवे दिन रात को मुझ से इसी मन्दिर में भेंट होगी और यदि उस दिन न मिलूं तो जान लेना कि फिर मुझसे भेंट न होगी।

‘ईश्वर आप को कुशल से रक्खे' यह कह कर विमला ने फिर प्रणाम किया।

युवा ने फिर एक बार अतृप्त लोचन से उस सुन्दरी की ओर दृष्टिपात करके और उसकी मन मोहनी मूर्ति को अपने हृदय में स्थापित कर घोड़े पर चढ़ प्रस्थान किया।


द्वितीय परिच्छेद ।

मोगल पठान ।

रातही में जगतासंह ने शैलेश्वर के मन्दिर से कूच किया। पाठक लोगों को यह संदेह होगा कि जगतसिंह राजपूत बङ्गदेश में क्या करने को आये और क्यों इस उजाड़ में अकेले फिरते थे अतएव तत्सामयिक बङ्गदेशीय राजकीय घटना का कुछ संक्षेप वर्णन इस स्थान पर उचित जान पड़ता है।

पहिले इस देश में बखतियार खिलजी ने यवन विजय पताका स्थापित किया और कई सौ बरस तक पठान लोग उसकी ओर से निष्कण्टक राज्य शासन करते रहे ९३२ के साल में प्रसिद्ध बाबर सुल्तान ने दिल्ली के महाराज इब्राहीम लोदी को पराजय करके सिंहासन छीन लिया और आप राजा बन बैठा। किन्तु उसी समय बङ्गदेश में तैमूर वंश वालों का अधिकार नहीं हुआ। जितने दिन तक मोगल कुल दीपक अकबर महाराज का उदय नहीं हुआ तब तक