पृष्ठ:दुर्गेशनन्दिनी द्वितीय भाग.djvu/९२

यह पृष्ठ प्रमाणित हो गया।
८८
दुर्गेशनन्दिनी।



झर झर शब्द कर रहे थे। दुर्ग के शिखर देश में उलूक बैठा गम्भीर स्वर से बोल रहा था और सामने जहां आयेशा खड़ी थी जल परिपूर्ण दुर्ग परिखा में आकाश पटल की परछाहीं चमक रही थी।

आयेशा बड़ी देर तक खिड़की में बैठी सोच रही थी। उंगली से एक अंगूठी उतारा कि जिसमें हीरे की कनी जड़ी थी। एकबेर मन में आया कि 'इसको चाट कर अभी से इस जगत से नाता छोड़ दें, फिर सोचा 'क्या विधाता ने मुझको इस संसार में इसी हेतु भेजा था यदि इतना भी दुःख सहन नहीं कर सकती तो जन्म धारण करके ही क्या किया? जगतसिंह सुनकर क्या कहेंगे?

फिर अंगूठी को पहिन लिया कुछ सोंच कर फिर उतार लिया मन में बिचारा कि 'इस लोभ को सम्हालना स्त्री के प्रति असाध्य है अतएव प्रलोभन को दूरही करना उचित है!'

यह कहकर आयेशा ने अंगूठी को उसी दुर्ग परिखा के जल में फेंक दिया।


दुर्गेशनन्दिनी द्वितीय भाग.djvu