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दुर्गेशनन्दिनी।



पहिनाभो देखो मै तुम्हारे सामने इस तरवारि को दो खण्ड कर डालता हूं।'

जब तिलात्तमा ने कुछ उत्तर नहीं दिया राजकुमार ने फिर कहा 'प्यारी मैं हंसी नहीं करता।'

तिलोत्तमा ने लज्जा से मुंह नीचा कर लिया।

उसी दिन सन्ध्या समय अभिराम स्वामी कोठरी में बैठे पोथी बांच रहे थे, कि जगतसिंह भी उन के समीप जाकर बैठे और बोले 'महाशय में एक बात पूछता हूं कि तिलोत्तमा अब यहां से दूसरे स्थान को चल सकती है फिर इस टूटे घर में रहने का क्या कारण है ? कल यदि दिन अच्छा है तो मान्दारणगढ़ को चलिये और यदि भापको अस्वीकार न हो तो कन्यादान देकर हमको कृतार्थ कीजिये।'

अमिराम स्वामी पोथी फेंक उठ खड़े हुए और राजकुमार को गले लगा लिया, इसका कुछ ध्यान नहीं हुआ कि पोथी पैर के नीचे दबी है।

जब राजकुमार स्वामी के निकट आरहे थे, बिमला उनके मन का भाव समझ कर पीछे २ चली और बाहर खड़ी होकर सब बात सुनती रही। राजकुमार ने बाहर आकर देखा कि बिमला ने फिर पूर्व भाव धारण कर लिया है और हंस रही है, आसमानी का बाल नोचती है और खिलखिलाती है। आसमानी इस अपमान का कुछ ध्यान न करके बिमला को अपने नाचने की परीक्षादे रही है। राजकुमार बगलिया कर निकल गए।