पृष्ठ:दुर्गेशनन्दिनी द्वितीय भाग.djvu/७५

यह पृष्ठ जाँच लिया गया।
७४
दुर्गेशनन्दिनी।


चाकरों को लेकर दुर्ग में उसमान आदि से विदा होने को चले। कारागार में सेंट होने के अनन्तर उसमान का युबराज पर बह भाव नहीं रहा जैसा पहिले था । अतएव सामान्य बात चीत करके उसने उनको विदा किया। .

वहां से जगतसिंह ईसाखा के पास गये और सब से पीछे आयेशा से विदा होने गये । महल के द्वार पर एक पहरे वाले से कहला भेजा कि जिस दिन से नवाब साहब मरे हैं उस दिन से देखा नहीं, अप में पटने जाता हूँ न जाने फिर आना हो, या न हो इसलिये मिलने आया हूँ।'

थोड़ी देर के याद खोजा ने आकर उत्तर दिया कि बीपी साहेबा कहती हैं कि मैं भेंट नहीं कर सक्ती मेरा अपराध क्षमा कीजिये।

राजपुत्र बहुत उदास होकर फिरे। द्वार पर उसमान उनकी राह देख रहा था।

उनको देखकर राजपुत्र ने पूछा 'यदि मुझसे कोई काम होतो कहो।'

उसमान ने कहा 'आप के सङ्ग बहुत से चाकर हैं सबके सामने नहीं कह सक्ता, इन लोगों से कह दीजिये कि आगे चलें और आप मेरे सङ्ग आइये"

राजपुत्र ने निःसंकोच सबको आगे बढ़ने का आदेश दिया और आप अकेले घोड़े पर चढ़कर उसमान के सह चले । उस मान भी धोड़े पर सवार था। थोड़े समय में दोनों एक शाल के जङ्गल में पहुंच बन के बीच में एक टूटी झोपड़ी थी जिसके देखने से बोध होता था कि किसी ने अपने छिपने को बनाई हो । घोड़ को एक पेड़ में बांँध दिया और दोनों भीतर गए। देखते क्या हैं कि एक ओर तो एक कबर खुदी पड़ी है और