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दुर्गेशनन्दिनी।



उसमान विस्मित हुआ और कुपित होकर बोला।

'हमसे मतलब है वा नहीं कल प्रातःकाल नवाब के सामने बताऊंगा।'

आयेशा ने कहा 'जब पिता हमसे पूछेंगे हम उत्तर दे लेंगे। तुम चिन्ता न करो।'

उसमान ने फिर ब्यंग करके सहा और यदि हमी पूछे?'

आयेशा उठ खड़ी हुई और देर तक उसके मुंह की ओर घूरती रही उसकी आंखें और बड़ी २ हो गयीं। बदन का रङ्ग पलट गया और एक ओर की लट भी खुल पड़ी और हृदय समुद्र की लहर की भांति कांपने लगा अति परिस्कार स्वर से बोली 'अच्छा यदि तुम पूछते हो तो मेरा यही उत्तर है कि म इस बन्दी को चाहती हूँ।'

उस समय यदि चक्र गिरता तो राजपुत्र अथवा पठान को इतना अधिक विस्मय न होता जगतासिंह की आंखें खुल सी गई और आयेशा के रोने का कारण अब जानपड़ा। उसमान ने पहिले भी इसका सन्देह किया था और इसी निमित्त आयेशा पर इतना लाल पीला हुआ किन्तु यह उसको स्वप्न म भी सम्भव न था कि वह उसके सामने 'बेबाकाना' बात करेगी। वह चुप रहा।

आयेशा कहने लगी "सुनो, उसमान मैं इस बन्दी को चाहती हूं-- इस जीवन में दूसरा कोई मेरा हाथ नहीं पकड़ सकता। कल यदि वधभूमि इसके रुधिर द्वारा अपनी पिपासा शान्ति करे।(यह कहते समय आयेशा कांप उठी)तो भी इसकी मनोहर मूर्ति अपने हृदय मन्दिर में स्थापित कर मरण पर्यन्त पूजती रहूंगी। अद्ध पश्चात यदि फिर इसका दर्शन न मिले और यह कोटियों स्त्री के झुंड में बिहार करे और मुझको