पृष्ठ:दुर्गेशनन्दिनी द्वितीय भाग.djvu/६०

यह पृष्ठ जाँच लिया गया।
५७
द्वितीय खण्ड।



शक्ति नहीं है, तुम हमारे घर चलकर विश्राम करो, फिर जहां चाहोगी वहां तुमको भेज दूंगी।’

तिलोत्तमा बोली नहीं।

आयेशा ने प्रहरी के मुंह से सब बातें सुनी थी तिलोत्तमा के मन के सन्देह की शंका कर बोली 'मैं तुम्हारे शत्रु की कन्या तो अवश्य हूँ परन्तु इससे तुम कुछ सन्देह न करो। मैं विश्वासघातिनी नहीं हूं। मैं कभी किसी से कुछ न कहूंगी। प्रात होते २ तुम जहां कहोगी मैं दासी द्वारा तुमको वहीं भेज दूंगी'

आयशा ने यह सब बातें ऐसे मीठे स्वर से कहीं कि तिलोत्तमा को विश्वास आ गया और उसके सङ्ग चलने को प्रस्तुत हुई।

आयशा ने कहा 'तुमसे चला न जायगा, इस दासी का कंधा पकड़ कर चलो।'

उसके कंधे पर हाय रक्खे तिलोत्तमा धीरे धीरे चली। आयेशा जब राजकुमार से विदा होने लगी वे उसके मुह की भार देखने लगे। उसने समझा कि कुछ कहेगे दासी से बोली तुम, इसको हमारे शयनागार में पहुंचा कर आओ तब मैं चलूंगी।’

दासी तिलोत्तमा को लेकर चली।

जगतसिंह ने मन में कहा 'यह हमारा तुम्हारा अन्तिम साक्षात है।' और फिर ठंढी सांस लेकर चुपचाप, जबतक तिलोत्तमा आंखों के ओर नहीं हो गयी, उसी को देखते रहे।

तिलोत्तमा भी सोचती थी कि 'यह हमारा तुम्हारा अन्तिम साक्षात है। और जबतक वे देख पढ़ते थे तबतक पीछे फिर कर नहीं देखा और अब देखा तो जगतसिंह को