पृष्ठ:दुर्गेशनन्दिनी द्वितीय भाग.djvu/६

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द्वितीय खण्ड।


जैसे उद्यान में पद्म का फूल शोभा देता है उसी प्रकार आयेशा से इस आख्यान की शांभा है। यदि कोई चित्रकार अपनी लेखनी लेकर इस अलेख रूपराशि का प्रतिबिम्ब उतारने की चेष्टा कर बैठता तो निश्चय है कि एक बेर उसको मूर्छा अवश्य आ जाती और ज्ञानशून्य हो जाता। पहिले तो उसको चम्पकरक्त और श्वेतवर्ण के अन्तर्गत शरीर के रङ्ग का रङ्ग कहां मिलता? फिर प्रशस्थ ललाट के लिखने के समय मन्मथ के रङ्ग भूमि का ध्यान न जमता मस्तक मध्य विलगित केश अर्ध चन्द्राकार जूड़ा पर्य्यन्त काकपक्ष की भांति कर्णदेश के ऊपर से घुमाने के समय हाथ अवश्य कांप जाता। निर्मल सुरसरिधार के निस्तृत स्थान से किञ्चित दूर पर बांकी भ्रूशैवाल के नीचे पलक पक्ष संचारित झख की जोड़ी प्रसन्नता पूर्वक खेलती हुई कदापि न बन सकती। उसके नीचे कीरबिम्ब फल के ऊपर बैठा हुआ कपोत की पीठ पर जिसके दोनों और दो भुजङ्ग हों केलि कर रहा हो और बीच में सिंहासन पर दो शालिग्राम की बटिया सरोवर के तीर पर धरी हों ऐसा रूप कब बन सकता है। सारांश जिसको बिधना ने स्वयं अनुपम बना दिया उसकी उपमा मनुष्य वापुरा क्या बना सकेगा। ऊपर की लाट बना कर अतिक्षीन लंक को ऊर्ध्व भार सहने के अयोग्य समझ उसने नीचे दो स्तंभ खड़े कर दिये जब भी चलते समय लच खाकर शरीर के दोहरा हो जाने का भय मन में लगा ही रहा। राजकुमार बहुत काल पर्यन्त आयेशा को देखते रहे और तिलोत्तमा का ध्यान आ गया और हदय विदीर्ण होकर शरीर क्षत द्वारा रुधिर वेग से बहने लगा। फिर मूर्छा आई और उन्होंने आंख बन्द कर ली।

स्त्री जो पलङ्ग पर बैठी थी डर कर खड़ी होगई और