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द्वितीय खण्ड।


तिलोत्तमा चुप रही और उसका हृदय कांपने लगा। फिर बिमला ने पूछा 'तू आज यह अपना वेष न त्यागेगी !'

तिलोत्तमा ने कहा 'नहीं।'

बि० । नाचने गाने न जायगी ?

ति० । नहीं।

बि० । तो क्या तू बच जायगी?

तिलोत्तमा रोने लगी । बिमला ने कहा 'स्थिर होकर सुन, मैंने तेरे छूटने के निमित्त उपाय किया है।'

तिलोत्तमा आग्रह से बिमला के मुंह की ओर देखती रही कि उसने उसमान वाली अंगूठी निकाल कर उसके हाथ में दिया और बोली 'इस अंगूठी को अपने पास रख, नाच घर में न जाना, आधीरात के इधर तो यह उत्सव समाप्त नहीं होगा तब तक मैं पठान को वहलाये रहूंगी मैं तेरी माता हूँ यह जान कर वह तुझको मेरे सामने न बुलावेगा । आधी रात को महल के द्वार पर जाना वहां एक मनुष्य तुझको ऐसी ही अंगूठी दिखावेगा । निशंक तू उसके सङ्घ चली जाना, जहां कहेगी वहां वह तुझको पहुँचाय देगा । तू उससे कहना कि मुझको अभिराम स्वामी के कुटी में ले चलो।

तिलोत्तमा को सुनकर पड़ा आश्चर्य हुआ और आनंद भी हुआ। थोड़ी देर कुछ कह न सकी फिर बोली 'यह तू क्या कहती है यह अंगूठी तुझको किसने दिया?'

बिमला ने कहा 'यह भारी कथा है फिर कभी अवकाश में तुझसे कहूंगी। अभी मैंने जैसा कहा है वैसाही करना।'

तिलोत्तमा ने कहा 'तेरी क्या दशा होगी तू कैसे बाहर आवेगी।'

बिमला ने कहा 'मेरी चिंता न कर मैं कल प्रात को नौकर