पृष्ठ:दुर्गेशनन्दिनी द्वितीय भाग.djvu/५

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दुर्गेशनन्दिनी।


राजकुमार धीमे स्वर में बोले 'मैं कहाँ हूँ ?'
उस स्त्री ने कहा 'आप चुपचाप रहे चिन्ता न करें।'
राजपुत्र ने फिर धीरे से पूछा ‘कै वजे होंगे ?'
स्त्री ने कहा 'दोपहर होगई। आप चुप रहिये बोलने से घाव टूटने का भय रहता हैं और नहीं तो हमलोग जाते हैं।'
राजपुत्र ने दीनता प्रकाश पूर्वक फिर पूछा 'तुम कौन हो ?'
स्त्री ने कहा 'हमारा नाम आयेशा है।'
राजकुमार चुपरहे और उसका मुंह देखने लगे। इस व्यापार को अभी तक किसी ने नहीं देखा था।

आयेशा २२ वर्ष से ऊपर न थी किन्तु उस की सुन्दरता शब्दों द्वारा प्रकाश करना बड़ा कठिन है तिलोत्तम भी परम सुन्दर थी पर इसमें और उसमें बड़ा भेद था। तिलोत्तमा नवकलिका की भांति कोमल, संकुचित और निरमल स्वभाव योवन के रस से अज्ञात थी सुख पर उसके भोलापन चमकता था। नेत्र हाव भाव और कामकटाक्ष को जानते ही न थे शरीर का भी उसको अभी अच्छा ज्ञान न था बालापन प्रत्येक अङ्ग से टपकता था। पर आयेशा ऐसी न थी। वह प्रातकालीन नलिनी की भांति विकसित सुवासित और रसपरिपूर्ण थी। शरीर की आभा गृह को दीप्तमान करती थी। यदि विमला की तुलना इससे करें तो भी नहीं हो सकती क्योंकि वह सुन्दर तो अवश्य थी परन्तु गृहस्थी के कर्म करने से उसके हाथ पैर कठोर थे और शरीर भीतर से पोला था। थदि तिलोत्तमा के शरीर की प्रभा बालशशि की भांति थी तो बिमला की तैलाधीन दीपक के समान थी और आयेशा की मध्यान्ह पूर्व मार्त्तण्डरश्मि की भांति जिसपर पड़ती थी वह खिल उठता था।