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दुर्गेशनन्दिनी।


ब्राह्मण ने उत्तर दिया ‘वह भी नवाब की उपपत्नी बनी दासी संयुक्त चैन करती है’।

राजकुमार ने तुरन्त ब्राह्मण का हाथ छोड़ दिया और वह गिरते २ बचा।

उसमान ने सकुच कर धीरे से कहा ‘मैं केवल सेनापति हूं’ राजपुत्र ने कहा ‘तुम पिशाचों के सेनापति हो’।

दसवां परिच्छेद।
प्रतिमा विसर्जन।

जगतसिंह को उस रात नींद नहीं आई। चिन्ता ग्रीष्मकालीन उत्तमभूमि के समान शरीर का दाह करती थी। जिस तिलोत्तमा के मरण पश्चात् राजपुत्र पृथ्वी को शून्य समझते बह तिलोत्तमा अद्य पर्यन्त जीती है यह दुःख उनके मन में उत्पन्न हुआ।

यह क्या ? तिलोत्तमा ने प्राण त्याग नहीं किया क्यों ? वह प्राणेश्वरी जिसके देखने से मन प्रसन्न होता था अभी जीती है ? जिस समय राजकुमार इस प्रकार चिन्ता करते थे उनकी आंखों से आंसू चले जाते थे। फेर दुराचारी कतलू खां के बिहारमन्दिर का ध्यान हुआ। वही शरीर अब यवन अंका मरण होगा।

हमारे हृदयमन्दिर की शोभादायनी मूर्ति पठान के भवन में है ? हा ! तिलोत्तमा कतलू खां की उपपत्नी हुई ?

अब क्या वह फिर कभी राजपूत का स्मरण करती होगी ? अपने हस्तच्युत प्रतिमा का पुनर्ग्रहण राजपूतों का कर्म नहीं है। हा ! आज उस मूर्ति का ध्यान करके हृदय विदीर्ण होता है