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द्वितीय खण्ड।



कहा 'नहीं मैं कहीं न जाऊंगा तुम मानसिंह के घर जाओ। मैं यहीं रहूंगा और नित्य तुमको देख आया करुंगा। जब मैं देख लूंगा कि तुम वहां कैसे रहती हो फिर वैसा प्रबन्ध करूंगा।'

हे युवराज! मैं उस दिन से तुम्हारे घर में रहने लगी और अपने प्राण प्रीतम से विलग हुई।

राजकुमार! मैं बहुत दिनों तक तुम्हारे पिता के घर में रही किन्तु तुम मुझ को नहीं चीन्हते। तब तुम्हारा वय केवल दश वर्ष का था और अपनी माता के साथ खेला करते थे। मैं तुम्हारी नबोढ़ा माता के संग दिल्ली में रहती थी। महाराज मानसिंह के पास स्त्रियां अनेक थीं तुम सब को थोही पहिचानते हो। योधपुर की उर्मिला तुमको स्मरण होगी उसके गुण का मैं तुमसे क्या वर्णन करूं। वह मुझको दासी करके नहीं मानती थी वरन भगिनी के तुल्य जानती थी। उसने मुझको अनेक विद्या सिखायी। उसीके अनुग्रह से मैंने शिल्प विद्या सीखी और नाच गाना भी मैंने उसी के चित्त विनोद के निमित्त सीखा। यह पत्र उन्हीं देवी के अनुग्रह का फल है।

उसकी कृपा से और भी अनेक लाभ हुए। उसने मुझको महाराज तक पहुंचाया और वे मेरा नाच गाना देख सुन कर बहुत प्रसन्न हुए और मुझको अपनी करके समझने लगे। वे मेरे पिता को भी मानते थे और कधी कधी मेरे देखने को आया करते थे। उरमिला के समीप रहकर मैने बड़ा सुख भोगा किन्तु एक दुःख था कि जिसके लिये सर्वस्व त्याग करने को प्रस्तुत थी वह मन मोहन नहीं मिला। वे क्या मुझको भूल गए? कदापि नहीं। युवराज! आसमानी नाम चेरी को क्या आप पहिचानते होंगे? उनके