पृष्ठ:दुर्गेशनन्दिनी द्वितीय भाग.djvu/१०

यह पृष्ठ जाँच लिया गया।
द्वितीय खण्ड।


और जगतसिंह?

बिषम ज्वर में पड़े शय्या पर भुगत रहे हैं।

दुर्गेशनन्दिनी द्वितीय भाग.djvu
तीसरा परिच्छेद।
तुम तिलोत्तमा नहीं हो?

दूसरे दिन सन्ध्या को जगतसिंह की कोठरी में उसमान और चिकित्सक चुपचाप बैठे थे आयेशा पलङ्ग पर बैठी हाथ से पंखा झल रही थी। चिकित्सक नाड़ी देख रहा था और जगतसिंह अचेत पड़े थे। चिकित्सक ने कहा 'आज की रात ज्वर उतरने पर यदि प्राण बच जाय तो फिर कुछ चिन्ता नहीं। अब वह समय आता जाता है।'

सब का मन ब्यग्र हो रहा था, चिकित्सक भी बार २ नाड़ी देखता था और 'अब नाड़ी बहुत सुस्त चलती है' 'अब तो कहीं मिलती ही नहीं' 'देखो यह चल रही है' कहता था। एकाएक उसका मुंह श्याम होगया और बोला 'देखो अब समय आ गया।'

आयेशा और उसमान कान लगाकर सुनते थे और भिषक नाड़ी पकड़े बैठा था।

थोड़ी देर बाद वैद्य ने कहा 'नाड़ी बहुत धीमी चलती है' आयेशा का मुंह और सूख गया और जगतसिंह के मुंह की भी आकृति बिगड़ चली बरन कुछ टेढ़ापन भी आ गया और स्वेतता छा गयी, हाथों की मुट्ठी बन्ध गयी आखैं घूम गयीं। आयेशा से जाना कि अब कुछ आशा नहीं, काल आन पहुंचा। चिकित्सक हाथ में एक शीशी लिये बैठा था जगतसिंह की इस अवस्था को देख उनका मुंह चीर औषधी भीतर डाल दी किन्तु वह ओठों द्वारा निकल पड़ी कुछ थोड़ीसी पेट में गयी।