पृष्ठ:दीवान-ए-ग़ालिब.djvu/१०६

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शाहिद-ए-हस्ति-ए-मुत्लक़ की कमर है ‘आलम
लोग कहते हैं कि है, पर हमें मंजूर नहीं

क़तरः अपना भी हक़ीक़त में है दरिया, लेकिन
हमको तक़्लीद-ए-तुनुक ज़रफ़ि-ए-मंसूर नहीं

हसरत, अय ज़ौक़-ए-ख़राबी, कि वह ताक़त न रही
'अिश्क-ए-पुर ‘अर्बदः की गौं तन-ए-रंजूर नहीं

मैं जो कहता हूँ, कि हम लेंगे क़यामत में तुम्हें
किस र‘अूनत से वह कहते हैं, कि हम हूर नहीं

जुल्म कर, जुल्म, अगर लुत्फ़ दरेग़ आता हो
तू तग़ाफ़ुल में किसी रँग से मा‘जूर नहीं

साफ़ दुर्दी कश-ए-पैमान:-ए-जम हैं, हम लोग
वाय, वह बादः, कि अफ़शुरदः-ए-अँगूर नहीं

हूँ ज़हूरी के मुक़ाबिल में ख़िफ़ाई ग़ालिब
मेरे दा‘वे प यह हुज्जत है, कि मशहूर नहीं

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नालः जुज़ हुस्न-ए-तलब, अय सितम इजाद, नहीं
है तक़ाजा-ए-जफ़ा, शिकवः-ए-बेदाद नहीं