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मुसकुरा गई और तत्काल अपना एक सुवर्ण कंकण उत्तार कर ठाकुर की कवित्वशक्ति का पुरस्कार दे गई। घर जाकर सच्चा हाल उसने अपने ससुर से कह सुनाया। उसके ससुर ने कहा कि दोनों कंकण दे देती तब ठाकुर की कवित्वशक्ति का पूर्ण पुरस्कार होता। महाराज पारीछत उस नवयौवना की यह उदारता देख भौचके से रह गए । पीछे से ज्ञात हुआ कि वह स्त्री स्वयं भी कविता करती थी, विदुषी थी, और "चितै जा चित जा" के विपला प्रयोग पर रीझकर उसने ऐसा किया था। महाराज पारीछत ने कई एक जनाने जेवर अपने तोशा- खाने से निकलवा कर उस स्त्री को उपहार रूप भेजवाए और कहला भेजा कि यह इनाम हम तुमको इस खुशी में देते हैं कि हमारी बस्ती में एक स्त्री भी कविता में निपुण है।

६-ठाकुर कवि यद्यपि कृष्णोपासक थे तथापि राम और कृष्ण को एक ही समझते थे। कहते हैं एक समय आप रोग प्रसित हुए और यह रोग इतना बढ़ गया कि प्राण बचना कठिन जान पड़ा। महाराज पारीछत ने अपने निज राजवैध को आज्ञा दी कि ठाकुर की चिकित्सा करो। वैधराज ने औषधि बनाई और कहा कि परसो शुभ दिन से औषधि सेवन करि- येगा । ठाकुर रोग को पीड़ा से व्याकुल थे, धीरज न धर सके और निम्नलिखित कवित्त कह के उसी दिन से औषधि सेवन करने लगे।

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कवित्त ।

राम मेरे पंडित अखंडित मुदिन सोधें,

राम मेरे गुरु जप मेरे राम नाम हैं।

राम राम गावहिं राम राम ध्यावहि,

राम राम सोचत कटत आठौ जाम हैं।