पृष्ठ:जायसी ग्रंथावली.djvu/४७४

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२९२
अखरावट

२९२ खरावट काहे चंद घटत है, काहे सूरज पूर । काहे होइ अमावसकाहे ला मूर ॥ जस किंतु माया मोह, तैसे मेघापवनजल । विज़री जैसे कोह, महमद तहाँ समाइ यह ॥ ५० ॥ सुनु चेला ! एहि जग कर अवना । सब बाहर भीतर है पवना ॥ सुन्न सहित बिधि पवनहि भरा । तहाँ श्राप होइ निमल करा ॥ पवनहि महूँ जो श्राप समाना। सब भा बरन ज्यों श्राप समाना ॥ जैस डोताए बेना डोले । पवन सवद होइ क्रिकृह न बोलें। पवनदि मिला मेघ जल भरई ! पवनहि मिला ठंद भुईं पई । पवनहि माँह जो कुल्ला होई। पवनहि , जाड़ भिलि सोई ॥ पवनहि पवन अंत होइ जाई । पवन हि तन कहेंयार मिलाई ॥ दाहा जिया जंतु जत सिरजा, सब माँ पवन सो पूरि । पवनहि पवन चाइ मिलि, नागि, धूरि बा, जल, ।। निति होई, साई जो ग्राज्ञा करे सो आयम । पवन परेवा सोइ, महमद विधि राखे रहै 1 ५१ ॥ बड़ करतार जिवन कर राजा। पवन बिना किछ करत न छाजा ! तेहि । पबन सकें बिजुरी साजामोहि मेघ परबत उपराजा ॥ उहै मेघ सकें करि देखाथे। उहै म मुनि जाइ छपावै। उहैचलाने चहें दिसि संोई। जस जस पाँव धरै जो कोई ॥ जहाँ चलईतस चलायें तहवाँ । जस जस नावें तस नवई न मार्च छिटकत झौंपे । तेहि मेघ सँग रून खन काँपे ॥ जस पिउ सेवा के चू । परै गाज कूट ॥ रूठेपुहमी तपि तहाँ - जहाँ गया मंह हैं । (५१) अवना = ग्राना, चा जाना । विवि = ईश्वर पवनहि = पवन में । । कराe= बलायोति । सब भा बरन. समाना = श्राप या उस ईश्वर के अनुकूल सब कT रूप रंग हा। । पवनहि = पवन ही से वह बुलबुला फूटता है। जाइ मिलि के जल में फिर मिल जाता है । फुट पवनहि पवन जाइ मिलि = कवि ने प्र चीन पाश्चात्य तत्वज्ञों के अनसार बापू को ही सबसे सूक्ष्म तत्व माना है और उसी को सबके मल में रखा है (उपनिषद् में नाका ग्रादिम और मूलभूत कहा गया है) । परेवा के पक्षी, दृत । (५२) मोहि = उसी पवन से । उपराजा - उत्पन्न किया । = वही ईश्वर उह । जा छपाने = जाकर अपने को छिपाता है ? नाब=द्मजाता है, प्रबत्त करता है । छिटकतशॉपे = (बिजली) छिटकते ही फिर छिप जाती है। सेवा सेवा = में । चूके = पर छूटे = , है । चकने । मारता हैपीटता ।