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पद्मावती नागमती विलाप खंड

नागमतिहिं 'पिय पिय' रट लागी। निसि दिन तपै मच्छ जिमि आगी॥
भँवर, भुजंग कहाँ, हो पिया। हम ठेघा तुम कान न किया॥
भूलि न जाहि कँबल के पाहाँ। बाँधत बिलँब न लागै नाहा॥
कहाँ सो सूर पास हौं जाउँ। बाँधा भँवर छोरि कै लाऊँ॥
कहाँ जाउ को कहै सँदेसा। ? जाउँँ सो तह जोगिन के भेसा॥
फारि पटोरहि, पहिरौ कथा। जौ मोहिं कोउ देखावै पंथा॥
वह पथ पलकन्ह जाइ बोहारौं। सीस चरन कै तहाँ सिधारौं॥

को गुरु अगुवा होइ, सखि! मोहि लावै पथ माँह।
तन मन धन बलि बलि करौं, जो रे मिलावै नाह ॥ ४ ॥

 

कै कै कारन रोवै वाला। जनु टूटहिं मोतिन्ह कै माला॥
रोवति भई, न साँस सँभारा। नैन चुवहिं जस ओरति धारा॥
जाकर रतन परै पर हाथ। सो अनाथ किमि जीवै, नाथा! ॥
पाँच रतन ओहि रतनहि लागे। परै पर हाथ। बेगि आउ, पिय रतन सभागे!॥
रही न जोति नैन भए खोने। स्त्रवन न सुनौं, बैन तुम लोने॥
रसनहि रस नहिं एकौ भावा। नासिक और बास नहिं आवा॥
तचि तचि तुम्ह बिनु अँग मोहि लागे। पाँचो दगधि विरह अब जागे॥

विरह सो जारि भसम कै, चहै उड़ावा खेह।
आइ जो धनि पिय मेरवै, करि सो देइ नइ देह ॥ ५ ॥

 

पिय बिनु व्याकुल बिलपै नागा। बिरहा तपनि साम भए कागा॥
पवन पानि कहँ सीतल पीऊ? । जेहि देखे पलुहै पन जीऊ॥
कहँ सो बास मलयगिरि नाहा। जेहि कल परति देत गलबाहाँ॥
पदमिनि ठगिनि भई कित साथा। जेहि तें रतन परा पर हाथा॥
होइ बसंत आवहु पिय केसरि। देखे फिर फूलै नागेसरि॥
तुम्ह बिनु, नाह! रहै हिय तचा। अब नहिं बिरह गरुड़ सौं बचा॥
अब अँधियार परा, मसि लागी। तुम्ह बिनु कौन बुझावै आगी?॥

नैन, स्त्रवन, रस रसना सबै खीन भए नाह।
कौन सो दिन जेहि भेंटि कै, आइ करै सुख छाँह ॥ ६ ॥

 



(४) आगी = आग में। ठेघा = सहारा या आश्रय लिया। सूर = भौंरे का प्रतिद्वंद्वी सूर्य। बोहारौं = झाड़ लगाऊँ। सील चरन कै = सिर को पैर बनाकर अर्थात् सिर के बल चलकर। (५) कारन = कारुण्य, करुणा, विलाप (अवधी)। ओरति = ओलती। पाँच रतन = पाँचों इंद्रियाँ। औहि रतनहि लागे = उस रत्नसेन की ओर लगे हैं। तचि तचि = जलजलकर, तपते से। पाँचो = पाँचों इंद्रियाँ। (६) नागा = नागमती। गरुड़ = गरुड़ जो नाग (यहाँ नागमती) का शत्रु है।