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जोगी खंड

भंवे भलेहि पुरुखन के डीठी। जिनहि जान तिन्ह दीन्ही पीठी॥

देहि असीत सवे मिलि, तुम्ह माथे निति छात।
राज करह चितउरगढ़राउ पिय! अहियात॥६॥

तुम्ह तिरिया मति हीन तुम्हारी। मूरुख सी जो मते घर नारी॥
तुम्ह तिरिया मति हीन तुम्हारी। सू रुख सी जो मते घर नारी॥
राघव जो सीता सँग लाई। रावन हरी, कवन सिधि पाई है॥
यह संसार सपन कर लेखा। बिखूरि गए जानों नहि देखा॥
राजा भरथरि सुना जो ज्ञानी। जेहि के घर सोरह से रानी॥
कुच लीन्हे तरवा सहराई। भा जोगी, कोड संग न लाई॥
जोगिहि काह भोग सर्दी काजू। चहै न धन घरनी श्री राजू॥
जूड़ कुरकुटा भीखहि चाहा। जोगी तात भात कर काहा॥

कहा न माने राजा, तजी सबाई भीर।
चला छाँड़ि के रोवत, फिरि के देइ न धीर॥७॥

रोवत माय, न बहुरत बारा। रतन च ला घर भा अँधियारा॥
बार मोर जो राजहिं रता। सो लै चला, सुआ परबता॥
रोवहिं रानी, तहि पराना। नोचहिं बार, करहिं खरिहाना॥
चूरहिं गिउ अभरन, उर हारा। अब कापर हम करब सिंगारा॥
जी कहँ कहहिं रहसि कै पीऊ। सोइ चला, काकर यह जीऊ॥
मरै चहहिं, पै मरै न पावहिं। उठै आगि, सब लोग वुझावहिं॥
घरी एक सुठि भएउ अँदोरा। पुनि पाछे बीता होइ रोरा॥

टूटे मन नौ मोती, फटे मन दस काँच।
लोन्ह समेटि सब अभरन, हौइगा दुख कर नाच ॥८॥

निकसा राजा सिंगी पूरी। छाँड़ा नगर मेलि कै धूरी॥
राय रान सब भए वियोगी। सोरह सहस कुँवर भए जोगो॥
माया मोह हरा सेइ हाथा। देखेन्हि वूझि निआन न साथा॥
छाँड़ेन्हि लोग कुटुंब सब कोऊ। भए निनार सुख दुख तजि दोऊ॥
सँवरैं राजा सोइ अकेला। जेहि के पंथ चले होइ चेला॥
नगर नगर औ गाँवहिं गाँवा। छाँड़ि चले सब ठाँवहि ठावाँ॥
काकर मढ़, काकर घर माया। ताकर सब जाकर जिउ काया॥

चला कटक जोगिन्ह कर कै गेरुआ सब भेसु।
कोस बीस चारिहु दिसि जानो फूला टेसु॥९॥


(६) भँवै = इधर उधर घूमती है। जिनहि... पीठी = जिनसे जान पहचान हो जाती है उन्हें छोड़ नए के लिये दौड़ा करती है। (७) मतै = सलाह ले। तात भात = गरम ताजा भात। (८) बारा = बालक बेटा। खरिहान करहिं ढेर लगाती हैं। अँदोरा = हलचल, कोलाहल (सं० आंदोलन)।

(९) पूरी = बजाकर। मेलि कै = लगाकर। निनार = न्यारे, अलग।