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संवत् १६६७।

अनूपरायका सिंहदलन होना।

४ शव्वाल (पौष सुदी ४) रविवारको बादशाह चीतेके शिकार में लगा हुआ था कि एक सिंह उठा और अनूपराय उससे लड़ा। इसका वृत्तान्त बादशाह यों लिखता है--"मैंने यह बात ठहराई है कि रविवार और गुरुवारको कोई जीव नहीं मारा जावे और मैं भी इन दोनो दिनों में मांस नहीं खाता हूं।"

"रविवारको तो इस हेतु कि मेरे पिता उस दिनको पवित्र जानकर मांस नहीं खाते थे। पशुहिंसाका भी निषेध था क्योंकि उस दिन रातको उनका जन्म हुआ था। वह फरमाया करते थे कि इस दिन उत्तम बात यही है कि जीव जन्तु कासाइयोंकेसे स्वभाववाले मनुष्योंकी दुष्टतासे बचे रहें।

गुरुवार मेरे राज्याभिषेकका दिन है। इस दिन मैंने भी जीवों के नहीं मारनेका हुक्म देरखा है। दोनों दिन शिकार भी मैं तीर और बन्दूकसे नहीं मारता हूं।

जब चीतेका शिकार होरहा था तो अनूपराय जो निज सेवकों मेंसे है, कई लोगोंको जो शिकार में साथ रहते हैं मुझसे कुछ दूर छोड़कर आता था। एक वृक्ष पर कई चीलें बैठी देख कमान और कई तुक्के लेकर उधर गया तो एक अधखाई गाय पड़ी देखी और साथही एक बड़ा भयङ्कर सिंह झाड़ों मेंसे निकल कर चला। उससमय दो घड़ीसे अधिक दिन नहीं था तोभी उसने उस सिंहको घेर कर मेरे पास आदमी भेजा। क्योंकि वह खूब जानता था कि मेरी रुचि सिंहके शिकार में कितनी अधिक है।

मेरे पास यह खबर पहुँची तो मैं तत्काल व्याकुलतासे घोड़ा दौड़ाता हुआ गया। बाबा खुर्रम, रामदास, एतमादराय, हयातखां तथा एक दो और मेरे साथ हुए। वहां पहुँचतेही मैंने देखा कि सिंह एक बृक्षकी छायामें बैठा है। मैंने चाहा कि घोड़े पर चढ़े ही चढ़े बन्दूक मारूं परन्तु घोड़ा एक जगह नहीं ठहरता था इस लिये मैं पैदल होगया और बन्दूक सीधी करके छोड़ी। सिंहके