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संवत् १६६७

जहांगीरकुलीखांने गुजरातसे चान्दीका एक सिंहासन भेजा जिसमें पच्चीकारीका काम नये रंग ढंगसे किया गया था।

महासिंहको झण्डा मिला।

अपराधियोंको दण्ड।

अफजलखांने बिहारसे कई दुष्टोंको पकड़ कर भेजा जिन्होंने निषेध हो जाने पर भी ख्वाजासरा बनाने और बेचनेका अपराध किया था। बादशाहने उनको जन्म भरके लिये कैद कर दिया।

विचित्र घटना।

अगली रातको एक विचित्र घटना हुई। दिल्लीके कुछ गवैये हुजूरमें गारहे थे और सैदी शाहको अमीर खुसरोकी एक बेत पर जोश आरहा था जिसका यह आशय था—

हरेक कौमका एक पन्थ एक धर्म्म और एक धाम है।

मैंने तो एक टेढ़ी टोपीवालेको अपना इष्टदेव बनाया है।

बादशाह इसकी कथा पूछ रहे थे कि मुल्ला अलीअहमद मोहर खोदनेवाला जिसके बापसे बादशाह वाल्यावस्था में पढ़ा करता था और जोअपने काम में उस्ताद था आगे बढ़कर अर्ज करने लगा कि एक दिन जमनाके तट पर शेख निजामुद्दीन औलिया बांकी टोपी झुकाये किसी छतसे हिन्दुओंकी पूजा देख रहे थे। इतने में उनका शिष्य अमीर खुसरो आया शैखने फरमाया कि तूने इन लोगोंको देखा साथही फारसी में यह कहा—

हरेक जातिका एक पग्य एक धर्म्म और एक धाम है।

खुसरोने अति भक्ति से अपने गुरुकी ओर देखकर फारसीमें यह दूसरा चरण पढ़ा—

मैंने तो एक टेढ़ी टोपीवाले को अपना इष्टदेव बनाया है।

मुल्लाअली जब यह कथा कहता हुआ टेढ़ी टोपीवाले के शब्द तक पहुंचा तो उसका हाल बदल गया वह अचेत होकर गिर पड़ा। बादशाह घबराकर उनके पास गया। वैद्य हकीम जो सभामें थे मृगीका भ्रम करके नाड़ी देखने और दवा देने लगे। परन्तु उसका काम तो गिरतेही पूरा होगया था उसको उठाकर