पृष्ठ:जमसेदजी नसरवानजी ताता का जीवन चरित्र.djvu/२२

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जीवन चरित्र।


आजाता। संसार गांधीजीके सात्विक विचारों पर चलने लगता! सभी देश अपने अपने देशके लिये चीजें बनाते, कमाते और खाते, अपना अपना राग अलापते। लेकिन इसके होनेकी कुछ संभावना नहीं मालूम होती है। दूसरे देश कोयला, धूआं, और बिजलीकी सहायता लेनेसे नहीं चूकनेवाले और न हमारी लाख प्रार्थना पर भी वे अपने मालको अपनेही घर रखने पर संतुष्ट हैं। वर्तमान विज्ञानके नयेसे नये आविष्कारोंसे सुसज्जित होकर, अपनी जीती जागती जातिके असंख्य रुपये लगाकर अपने बाहुबलसे प्राप्त की हुई राजनैतिक सुविधाओंसे लाभ उठाते हुए, अन्य देश साल साल, महोने महीने, दिन दिन, घड़ी घड़ी और छिन छिन हमारे बाजारोंको सस्ती चीजोंसे पाटपाट कर अपार धन ढोढोकर ले जारहे हैं। संसारकी घुड़दौड़में न शरीक होकर अपने घरकी रक्षा करने ही किस असाधारण, उद्योगकी, किस अटल धैर्य, किस अतुलनीय देशभक्तिकी और कितनी सच्ची राज-भक्तिकी आवश्यकताहोगी कुछ ठिकाना है: उद्योगके शिखरपर पहुंचे हुए यूरोपीय देशों और कलापटु जापानका मुकाबिला हम अपने टूटे चरखों और ढीले ढाले करघोंसे कर सकैंगे, यह उतना ही सम्भव है जितना बड़े बड़े किलोको महिम्नस्तोत्रसे उड़ा देना।

हर्षकी बात है, कि ताता महोदय के विचार समय के अनुकूल थे। आपके प्रत्येक कार्य देशकालके अनुसार होते थे। समुन्नत देशोंकी भांति आपने भी अग्नि, वरुण और विद्युतकी उपासना