पृष्ठ:जनमेजय का नागयज्ञ.djvu/७२

यह पृष्ठ जाँच लिया गया है।
६७
दूसरा अङ्क—पाँचवाँ दृश्य
[ तक्षक दौडकर उसे पकड़ लाता है। दूसरी ओर से मनसा का प्रवेश ]

मनसा―नागराज, क्या करते हो! स्त्रियो पर यह अत्याचार! छोड़ो इसे! पहले अपनी रक्षा करो!

[ तक्षक सरमा को छोड़ देता है ]
 

तक्षक―क्या! अपनी रक्षा!

मनसा―हाँ, हाँ, अपनी रक्षा! जनमेजय की सेना फिर तक्षशिला मे पहुँच गई है। भाई वासुकि नाग सेना एकत्र करके यथाशक्ति उन्हे रोक रहे है। आर्यों का यह आक्रमण बड़ा भया- नक है। वे तुम लोगो से भी बढ़कर बर्वरता दिखला रहे है। जा लोग वन्दी होते हैं, वे अग्निकुण्ड मे जला दिए जाते है। गांव के गाँव दग्ध हो रहे है। नाग जाति बिना रक्षक की भेड़ो के समान भाग रही है। आर्यों की भीषण प्रतिहिंसा जाग उठी है। जनमेजय कहता है कि पिता को जलाकर मारने का प्रतिफल इन नागो को उसी प्रकार जलाकर दूँँगा। हाहाकार मचा हुआ है।

सरमा―क्यो मनसा, अब मैं जाऊँ, या तक्षक के हाथो प्राण दूँ? यादवी प्राणो को भिक्षा नहीं चाहती।

मनसा―सरमा! यदि हो सके, तो इस विपत्ति के समय नागो की कुछ सहायता करो।

सरमा―नहीं मनसा। यह आग तुम्हीं ने भड़काई है। इसे बुझाने का साधन मेरे पास नहीं है।

काश्यप―और मैं, मैं क्या करूँ! हाय रे! मैं क्या― मैं क्या―!