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जनमेजय का नाग-यज्ञ

दामिनी―व्यर्थ इतनी त्वरा क्यो? और भी तो छात्र हैं! कोई कर लेगा। ठहरो।

उत्तङ्क―किन्तु गुरु-देव की आज्ञा है; मुझी पर यह सारा भार है। नहीं तो वे अप्रसन्न होंगे।

दामिनी―मै उन्हे समझा लूँगी; तुम्हे इसकी चिन्ता क्या है। और, फिर, जो दूसरो की परवा नहीं करते, उनके लिये दूसरे क्यों अपना सिर मारे।

उत्तङ्क―यह बात तो मेरी समझ में नहीं आई।

दामिनी―तुम्हे तो वैसी शिक्षा ही नहीं मिली है। तुम क्यो इसे समझने लगे!

उत्तङ्क―जैसा आप समझें। गुरुजी तो कह रहे थे कि अब की आने पर तुम्हें छुट्टी दे देंगे; तुम्हारा अध्ययन समाप्त हो चुका। किन्तु―

दामिनी―तो कुछ समझते ही नहीं!

उत्तङ्क―किन्तु मैं दार्शनिक प्रतिज्ञाएँ अपने सहपाठियो से भी विशेष शीघ्र समझता था; और गुरुजी की भी यही धारणा है।

दामिनी―अच्छा बताओ, तुम फूल क्यो चुनते हो?

उत्तङ्क―मुझे भले लगते हैं।

दामिनी―तब तो तुम मानते हो कि जिसे जो भला लगे, उसे वह स्वायत्त करे; क्यों?

उत्तङ्क―ठहरिए! इस प्रतिज्ञा मे कोई आपत्ति तो नहीं है?