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छाया
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एलिस ने आश्चर्य और उदासी-भरी एक दृष्टि सुकुमारी पर डाली । एलिस को भोजन कैसा लगा, सो नहीं कहा जा तकता।

भारत में शान्ति स्थापित हो गयी है । अब विल्फर्ड और एलिस अपनी नील की कोठी पर वापस जानेवाले है । चन्दनपुर में उन्हें बहुत दिन रहना पड़ा। नील-कोठी बहां से दूर है।

दो घोड़े सजे-सजाये खड़े है और किशोर सिंह के आठ सशस्त्र सिपाही उनको पहुँचाने के लिये उपस्थित है । विल्फर्ड साहब किशोर सिंह से बातचीत करके छुट्टी पा चुके है । केवल एलिस अभी तक भीतर से नही आयी। उन्ही के आने की देर है।

विल्फर्ड और किशोर सिंह पाईं-बाग में टहल रहे थे । इतने-में सात-आठ स्त्रियों का झुण्ड मकान से बाहर निकला । हैं ! यह क्या ? एलिस ने अपना गाउन नहीं पहना, उसके बदले फीरोजी रंग के रेशमी कपड़े का कामदानी लहंगा और मखमल की कंचुकी,जिसके सितारे रेशमी ओढ़नी के ऊपर से चमक रहे हैं। है! यह क्या ? स्वाभाविक अरुण अधरों में पान की लाली भी है, आंखों में काजल की रेखा भी है, चोटी भी फूलों से गूंधी जा चुकी है और मस्तक में सुन्दर छोटा-सा बाल-अरुण की तरह विन्दु भी तो है !

देखते ही किशोर सिंह, खिलखिलाकर हँस पड़े, और विल्फर्ड तो भौं चक्के-से रह गये।

किशोर सिंह ने एलिस से कहा---आपके लिये भी घोड़ा तैयार है--- पर सुकुमारी ने कहा---नहीं, इनके लिये पालकी मॅगा दो।


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