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छाया
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तीर निकाला, उसके रक्त को धोया, बहुत कुछ ढाढ़स दिया । किन्तु घायल स्त्री का चिल्लाना-कराहना सहज में थमनेवाला नहीं था ।

बालक की मां विधवा थी, कोई उसका रक्षक न था । जब उसका पति जीता था, तब तक उसका संसार अच्छी तरह चलता था; अब जो कुछ पूंजी बच रही थी, उसी में वह अपना समय बिताती थी । ज्यों-त्यों करके उसने अपने चिर-संरक्षित धन में से पचीस रुपये उस घायल स्त्री को दिये।

वह स्त्री किसी से यह बात न कहने का वादा करके अपने घर गयी । परन्तु बालक का पता नहीं, वह डर के मारे घर से निकल किसी ओर भाग गया ।

माता ने समझा कि पुत्र कहीं डर से छिपा होगा, शाम तक आ ही जायगा । धीरे-धीरे सन्ध्या-पर-सन्ध्या, सप्ताह-पर-सप्ताह, मास-पर-मास बीतने लगे; परन्तु बालक का कहीं पता नही । शोक से माता का हृदय जर्जर हो गया, वह चारपाई पर लग गयी । चारपाई ने भी उसका ऐसा अनुराग देखकर उसे अपना लिया, और फिर वह उस पर से न उठ सकी । बालक को अब कौन पूछनेवाला है !


कलकत्ता-महानगरी के विशाल भवनों तथा राजमागों को आश्चर्य से देखता हुआ एक बालक एक सुसज्जित भवन के सामने खड़ा है। महीनों कष्ट झेलता, राह चलता, थकता हुआ बालक यहां पहुंचा है।

बालक थोड़ी देर तक यही सोचता था कि अब मैं क्या करूँ, किससे अपने कष्ट की कथा कहूँ। इतने में वहां धोती-कमीज़ पहने हुए एक सभ्य बंगाली महाशय का आगमन हुआ।

उस बालक की चौड़ी हड्डी, सुडौल बदन और सुन्दर चेहरा देखकर बंगाली महाशय रुक गये और उसे एक विदेशी समझकर पूछने लगे--