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चोखे चौपदे

आज भी है याद वैसी ही बनी।
है वही रंगत औ चाहत है वही॥
तुम तरस खा कर कभी मिलते नहीं।
ऑख अब तक तो तरसती ही रही॥

देखने ही के लिये सूरत बनी।
देखने ही में न वह पीछे पड़े॥
आँख में चुभ कर न ऑखों मे चुभे।
ऑख मे गड़ कर न आँखों में गड़े॥

जो किसी को लगा बुरा धब्बा।
तो ढिठाई उसे नहीं धोती॥
सामने आँख तब करें कैसे।
सामने आँख जब नहीं होती॥

हो सराबोर तुम रसों में, तो।
मै रसों का अजीब सोता हू॥
किस लिये आँख यों बचाते हो।
मैं नही आँखफोड़ तोता हूं॥