पृष्ठ:चित्रशाला भाग 2.djvu/२६

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स्वतंत्रता

१७स्वतंत्रता ge . प्रियंवदा-मैं तुम्हें चाहती हूँ, तुम्हारा प्रेम चाहती हूँ और कुछ नहीं चाहती। सुखदेव०-तो प्रेम और स्वतंत्रता में सो बढ़ा अंतर है। जो प्रेम चाहता है, वह प्रेम का चलन भी चलता है। प्रेमी जन स्वतंत्र का होते हैं ? वे तो घोर परतंत्र होते हैं। जहाँ प्रेम होता है, वहाँ स्वतंत्रता तथा अधिकार का प्रश्न कभी उठ ही नहीं सकता। इतना सुनते ही प्रियंवदा उठकर पति से लिपट गई और उनके कंधे पर सिर रखकर सिसकती हुई वोली-यदि तुम इसी कारण मुझसे रुष्ट हो, तो मैं शपथ खाती हूँ कि आज से कभी स्वतंत्रता का नाम भी न लँगी । जिसमें तुम्हारी प्रसन्नता होगी, वही करूँगी। सुखदेव०-यदि यह बात है, तो मैं भी शपथ खाता हूँ कि आज से मैं तुम्हें अपने प्रणय का कैदी बना लूँगा!. यह कहकर सुखदेवप्रसाद ने पती को हृदय से लगा लिया।