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निराला



है। उसके भीतर हृदय का दीप तो गुल हो चुका है, पर, बाहर अंध मंदिर-हृदय का द्वीप वह जला आती है।

यशस्वी साहित्यिक नरेंद्र ने उधर से जाते हुए, दीपक जलाकर देवता को प्रणाम करते समय कई बार आभा का दिव्य मुख और विशाल आँखों की सकरुण दृष्टि देखी। कई शुभ सान्ध्य क्षण उसे कारुण्य से ओत-प्रोत कर चुके—उसके हृदय में सहानुभूति का तैल संचित हुआ; वेदना की वर्तिका में समाज की कुप्रथा की आग—उसके हृदय का द्वीप जला।

यह प्रकाश कई बार, रास्ते में, मंदिर की सीढ़ियों पर, आभा के म्लान मुख पर पड़ा, प्रतिफलित हुआ। आभा के अंतःपुर की रूपसी ने अंतःपुर में उसे उतने ही निकट संबंध से पहचाना, जितने दूर व्यवहार से आभा धारा से दूर हो गई थी।

हाय रे जीवन! कितने आवर्तों से तू प्रवाहित होता है! जिन कारणों से आभा पृथ्वी से छुटी थी, वे ही उसे नरेंद्र के साथ लपेटने लगे। मन से वह नरेंद्र की दृष्टि की तरह उसके नज़दीक हो गई। वह आज एकांत में नरेंद्र से पूछना चाहती है—इस संसार-दुःख से मुक्ति पाने का कौन-सा मार्ग है। वह विद्वान् होकर उसे वंचित न करेगा—नः, वह धोका नहीं दे सकता—उसकी आँखें इसका विशद साक्ष्य देती हैं, फिर वह भी तो उसीकी तरह विधुर है—जानता है, व्यर्थ स्नेह कितना दुःखद, कितना कठोर है। होगा कि स्त्री न होने के कारण वह इतना दुःख, इतना अपमान न पा रहा हो; पर स्त्री होने के कारण कभी उसने कल्पना तो की होगी कि उसके न रहने पर उसकी स्त्री को क्या होगा। आभा का हृदय भर आया।

पर, आज-आज करके कई आज पार कर चुकी। नरेंद्र आज मिला। वह सोपान-सोपान उतर रही थी, नरेंद्र चढ़ रहा था। बहुत कुछ कहना चाहा था, पर कुछ भी न कह सकी। कितना हृदय धड़का! चुपचाप खड़ी रही। नरेंद्र ऊपर चला गया।