पृष्ठ:चंद्रकांता संतति भाग 6.djvu/५२

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देखिये, चबूतरे के बगल में नीचे की तरफ कड़ी लगी हुई है और इसके साथ नथी हुई जो बारीक जंजीर है वह (हाथ का इशारा करके) इस तरफ एक कुएं में गिरी हुई है। इसी तरह हरएक चबूतरे में कड़ी और जंजीर लगी हुई है जो सब उसी कुएँ में जाकर इकट्ठी हुई हैं । मैं नहीं कह सकता कि उस कुएं के अन्दर क्या है, मगर उसकी तासीर यह थी कि इन चबूतरों को कोई छू नहीं सकता था। इसके अतिरिक्त आपको यह सुनकर ताज्चुब होगा कि उस चुनार वाले तिलिस्मी चबूतरे में भी जिस पर पत्थर का (असल में किसी धातु का) आदमी सोया हुआ है, एक जंजीर लगी हुई है और वह जंजीर भी भीतर-ही-भीतर यहाँ तक आकर उसी कुएं में गिरी हुई है जिसमें वे सब जंजीरें इकट्ठी हुई हैं, बस यही और इतना ही यहाँ का तिलिस्म है। इसके अतिरिक्त दरवाजों को छिपाने के सिवाय और कुछ भी नहीं है। हम दोनों भाइयों को तिलिस्मी किताब की बदौलत यह सब हाल मालूम हो चुका था, अतएव जब हम दोनों भाई यहाँ आए थे तो इन चबूतरों से बिल्कुल हटे रहते थे। पहला काम हम लोगों ने जो किया वह यही था कि ये नालियां जो पानी से भरी और बहती हुई आप देख रहे हैं, जिस पहाड़ी झरने की बदौलत लबालब हो रही हैं उसमें से एक नई नाली खोदकर उसका पानी उसी कुएँ में गिरा दिया जिसमें सब जंजीरें इकट्ठी ई हैं क्योंकि वह चश्मा भी उस कुएँ के पास ही है और अभी तक उसका पानी उस कुएँ में बराबर गिर रहा है । जब उस चश्मे का पानी (कई घण्टे तक) कुएं के अन्दर गिरा-तब इन चबूतरों का तिलिस्मी असर जाता रहा और ये छूने के लायक हुए मानो उस कुएँ में बिजली की आग भरी हुई थी जो पानी गिरने से ठंडी हो गई। हम दोनों भाइयों ने तिलिस्मी खंजर से सब जंजीरों को काट-काट इन चबूतरों का और उस चुनारगढ़ वाले तिलिस्मी चबूतरे का भी सम्बन्ध उस कुएँ से छुड़ा दिया, इसके बाद इन चबूतरों को खोलकर देखा और मालूम किया कि इनके अन्दर क्या है। अब आपकी आज्ञा होगी तो ऐयार लोग इस दौलत को चुनारगढ़ या जहाँ आप कहेंगे, वहाँ पहुँचा देंगे।"

इसके बाद इन्द्र जीतसिंह ने महाराज की आज्ञानुसार उन चबूतरों का ऊपरी हिस्सा, जो सन्दूक के पल्ले की तरह खुलता था, खोल-खोलकर दिखाया। महाराज तथा और सब कोई यह देखकर बहुत प्रसन्न हुए कि उनमें बेहिसाब धन-दौलत और जेवरों के अतिरिक्त बहुत-सी अनमोल चीजें भी भरी हुई हैं जिनमें से दो चीजें महाराज ने बहुत पसन्द कीं। एक तो जड़ाऊ सिंहासन जिसमें अनमोल हीरे और माणिक विचित्र ढंग से जड़े हुए थे और दूसरा किसी धातु का बना हुआ एक चन्द्रमा था । इस चन्द्रमा में दो पल्ले थे, जब दोनों पल्ले एक साथ मिला दिये जाते तो उसमें से चन्द्रमा की तरह साफ और निर्मल तथा बहुत दूर तक फैलने वाली रोशनी पैदा होती थी।

उन चबूतरों के अन्दर की चीजों को देखते-ही-देखते तमाम दिन बीत गया। उस समय कुंअर इन्द्रजीतसिंह ने महाराज की तरफ देखकर कहा, "इस बाग में इन चबूतरों के सिवाय और कोई चीज देखने योग्य नहीं है और अब रात भी हो गई है, इस-

लिए यद्यपि आगे की तरफ जाने में कोई हर्ज तो नहीं है, मगर आज की रात इसी बाग में ठहर जाते तो अच्छा था।"

च०-स०-6-3