पृष्ठ:चंद्रकांता संतति भाग 6.djvu/१७६

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दारोगा तो फिर जैसे बने, हम इनसे निपट लें! इन्द्रदेव--हाँ-हाँ !

दारोगा--पीछे उलाहना न देना, क्योंकि आप इन्हें अपना भाई समझते हैं!

इन्द्रदेव--मैं कभी उलाहना न दूंगा।

दारोगा--अच्छा तो अब मैं जाता हूँ, फिर कभी मिलूंगा तो बातें करूंगा!

इन्द्रदेव ने इस बात का कुछ भी जवाब न दिया। हां, जब दारोगा साहब वहाँ से बिदा हुए तो उन्हें दरवाजे तक पहुंचा आये । जब लौटकर कमरे में मेरे पास आये तो मुस्कुराते हुए बोले, “आज तो तुमने इसकी खूब खबर ली। 'जो बात तुम्हारे गुरुभाई साहब को नहीं मालूम है, वही बात' इन शब्दों ने तो उसका कलेजा छेद दिया होगा। मगर तुमसे बेहतर रंज होकर गया है, इस बात का खूब खयाल रखना।"

मैं--आप इस बात की चिन्ता न कीजिए, देखिए मैं इन्हें कैसे छकाता हूँ। मगर वाह रे आपका कलेजा ! इतना कुछ हो जाने पर भी आपने अपनी जुबान से कुछ न कहा, बल्कि पुराने बर्ताव में बल तक न पड़ने दिया !

इन्द्रदेव--मैंने तो अपना मामला ईश्वर के हवाले कर दिया है।

मैं-खैर, ईश्वर अवश्य इन्साफ करेगा। अच्छा तो अब मुझे भी बिदा कीजिए, क्योंकि अब इसके मुकाबले का बन्दोबस्त शीघ्र करना पड़ेगा।

इन्द्रदेव--यह तो मैं फिर कहूँगा कि आप बेफिक्र न रहिए । थोड़ी देर तक और बातचीत करने के बाद मैं इन्द्रदेव से बिदा होकर अपने घर आया और उसी समय से दारोगा के मुकाबले का ध्यान मेरे दिमाग में चक्कर लगाने लगा।

घर पहुँचकर मैंने सब हाल अपनी स्त्री से बयान किया और ताकीद की कि हरदम होशियार रहा करना। उन दिनों मेरे यहाँ कई शागिर्द भी रहा करते थे, जिन्हें मैं ऐयारी सिखाता था। उनसे भी यह सब हाल कहा और होशियार रहने की ताकीद की। उन शागिर्दो में गिरिजाकुमार नाम का एक लड़का बड़ा ही तेज और चंचल था, लोगों को धोखे में डाल देना तो उसके लिए मामूली बात थी। बातचीत के समय वह अपना चेहरा ऐसा बना लेता था कि अच्छे-अच्छे उसकी बातों में फंसकर बेवकूफ बन जाते थे। यह गुण उसे ईश्वर का दिया हुआ था जो बहुत कम ऐयारों में पाया जाता है । अतः गिरिजाकुमार ने मुझसे कहा कि "गुरुजी, यदि दारोगा वाला मामला आप मेरे सुपुर्द कर दीजिए, तो मैं बहुत ही प्रसन्न होऊँगा और उसे ऐसा छकाऊँगा कि वह भी याद करे । जमानिया में मुझे कोई पहचानता भी नहीं है, अतएव मैं अपना काम बड़े मजे में निकाल लूंगा।"

मैंने उसे समझाया और कहा कि "कुछ दिन सब्र करो, जल्दी क्यों करते हो, फिर जैसा मौका होगा किया जायेगा।" मगर उसने एक न मानी । हाथ जोड़कर और खुशामद करके, गिड़गिड़ा करके, जिस तरह हो सका, उसने आज्ञा ले ही ली और उसी दिन सब सामान दुरुस्त करके मेरे यहां से चला गया।

अब मैं थोड़ा-सा हाल गिरिजाकुमार का बयान करूंगा कि इसने दारोगा के साथ क्या किया।