पृष्ठ:चंद्रकांता संतति भाग 6.djvu/१००

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भूतनाथ--अच्छा, तो अब मैं ऐसा ही करूंगा, मगर यह तो बताओ कि शेर की लड़की 'गौहर' से तुमसे क्या नाता है?

रामदेई--उस मुसलमानिन से मुझसे क्या नाता होगा ! मैंने तो उसकी सुरत भी नहीं देखी।

भूतनाथ--लोग तो कहते हैं कि तुम उसके यहाँ भी आती-जाती हो और मेरे बहुत से भेद तुमने उसे बता दिये हैं।

रामदेई--सब झूठ है । ये लोग बात लगाने वाले जैसे ही धूर्त और पाजी हैं वैसे ही तुम सीधे और बेवकूफ हो।

अब भूतनाथ अपने गुस्से को बर्दाश्त न कर सका और उसने एक चपत रामदेई के गाल पर ऐसी जमाई कि वह तिलमिला कर जमीन पर लेट गई, मगर उसे चिल्लाने का साहस न हुआ । कुछ देर बाद वह उठ बैठी और भूतनाथ का मुंह देखने लगी।

भूतनाथ--कमीनी हरामजादी ! जिनके लिए मैं जान तक देने को तैयार हूँ उन्हीं लोगों की शान में तू ऐसी बातें कह रही है जो एक पराये को भी कहना उचित नहीं है और जिसे मैं एक सायत के लिए भी बर्दाश्त नहीं कर सकता ! ले समझ ले और कान खोल कर सुन ले कि तेरे हाथ की लिखी वह चिट्ठी मुझे मिल गई है जो तूने चाँद वाले दिन गौहर के यहाँ मिलने के लिए नन्हीं के पास भेजी थी और जिसमें तूने अपना परिचय 'करौंदा की ये-छैये' दिया था। बस, इसीसे समझ ले कि तेरी सब कलई खुल गई और तेरी बेईमानी लोगों को मालूम हो गई । अब तेरा नखरे के साथ रोना बातें बना कर अपने को बेकसूर साबित करना व्यर्थ है। अब तेरी मुहब्बत, एक रत्ती बराबर मेरे दिल में नहीं रह गई और तुझे उस जहरीली नागिन से भी हजार दर्जे बढ़ के समझने लग गया जिसे खूबसूरत होने पर भी कोई हाथ से छूने तक का साहस नहीं कर सकता । मुझे आज इस बात का सख्त रंज है कि मैंने तुझे इतने दिन तक प्यार किया और इस बात की सरफ कुछ भी ध्यान न दिया कि उस मुहब्बत, ऐयाशी और शौक का नतीजा एक-न- एक दिन जरूर भयानक होता है जिसे छिपाने की जरूरत समझी जाती है और जिसका जाहिर होना मिन्दगी और बेहयाई का सबब समझा जाता है। मुझे इस बात का भारी अफसोस है कि तुझसे अनुचित सम्बन्ध रखकर मैंने उस उचित सम्बन्ध वाली का साथ छोड़ दिया जिसकी जूतियों की बराबरी भी तू नहीं कर सकती या यों कहना चाहिए कि तेरे शरीर का चमड़ा जिसकी जूतियों में भी देखना मैं पसन्द नहीं कर सकता। मुझे इस बात का दुःख है कि नागर या मायारानी के कब्जे से तुझे छुड़ाने के लिए मैंने तरह-तरह के ढोंग रचे और इसका दम भर के लिए भी विचार न किया कि मैं उस क्षयी रोग को अपनी छाती से लगाने का प्रबन्ध कर रहा हूँ जिसे पहली ही अवस्था में ईश्वर की कृपा ने मुझसे अलग कर दिया था। ये बातें तू अपने ही लिए न समझ, बल्कि अपने जाए नानक के लिए भी समझ कर मेरे सामने से उठ जा और उससे भी कह दे कि आज से मेरे सामने आकर मेरी जूतियों का शिकार न बने । यदि मेरे पुराने विचार न बदल गये होते और उन दिनों की तरह आज भी मैं पाप को पाप न समझता होता तो आज तेरी खाल खिचवा कर नमक और मिर्च का उबटन लगवा देता, मगर खैर, अब इतना ही

च०स०-6-6