पृष्ठ:चंद्रकांता संतति भाग 5.djvu/२३

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तुम भी विधवा हो और मैं भी विधवा हूँ, तुम भी नौजवान और आशिक-मिजाज मैं भी नौजवान और आशिक-मिजाज हूँ, तुम भी इन्द्रजीतसिंह के फेर में पड़कर दुःख भोग रही हो और मैं भी आनन्दसिंह की मुहब्बत में इस दशा तक आ पहुँची हूँ, अब भी मेरी और तुम्हारी किस्मतों का फैसला एक साथ और एक ही ठिकाने हो सकता है क्योंकि इन्द्रजीतसिंह और आनन्दसिंह भी आजकल जमानिया में तिलिस्म तोड़ रहे हैं, अगर हम तुम एक होकर काम करें तो बहुत जल्द दुश्मनों का नाम-निशान मिटाकर अपने प्यारों के साथ दुनिया का सुख भोग सकती हैं, मगर इस समय तुम्हारे दो कंटक दिखाई देते हैं।

माधवी––हाँ, एक तो मेरा भाई भीमसेन, और दूसरा मेरा सेनापति कुबेरसिंह, मगर तुम इन दोनों का कुछ भी खयाल न करो, इस समय हमें इन दोनों को मिला-जुलाकर काम ले लेना चाहिए फिर तुम जैसा कहोगी वैसा किया जायेगा।

मायारानी––शाबाश-शाबाश! यही मालूम करने के लिए मैं तुमसे निराले में बातचीत किया चाहती थी क्योंकि ये बातें ऐसी हैं कि सिवाय मेरे और तुम्हारे किसी तीसरे का न जानना ही अच्छा है।

माधवी––निःसन्देह ऐसा ही है, हम दोनों के दिल की बातें हवा को भी मालूम न होनी चाहिए। आज बड़ी खुशी का दिन है कि हम दोनों जो एक ही तरह का दिल रखती हैं यहाँ पर आ मिली हैं, अब हम दोनों को हमेशा मेल-मिलाप रखने और समय पड़ने पर एक-दूसरे की मदद करने के लिए कसम खाकर मजबूत हो जाना चाहिए।

पाठक, मायारानी और माधवी दोनों ही अपना मतलब देख रही हैं। दोनों ही धूर्त, दोनों ही खुदगरज, और दोनों विश्वासघातिनी हैं। इस समय कुछ देर तक दोनों में घुल-घुलकर बातें होती रहीं, वादे भी हुए और कसमें भी खाई गईं। इसके बाद फिर भीमसेन और कुबेरसिंह बुलाए गए तथा लीला भी आ गई और आपस में बातें होने लगीं।

भीमसेन––अच्छा तो अब क्या निश्चय किया जाता है? राजा गोपालसिंह की चिट्ठी लेकर जमानिया कौन जायेगा और क्या होगा?

मायारानी––पहले तुम अपनी राय दो।

भीमसेन––मेरी राय तो यह है कि लीला रामदीन की सूरत बना दीवानसाहब के पास जाये और वहाँ से उनकी फरमाइश लेकर 'पिपलिया घाटी' पहुँचे और हम लोग भी अपनी फौज लेकर वहीं मौजूद रहें। लीला को यह चाहिए कि उन दो सौ सवारों को जिन्हें जमानिया से अपने साथ लायेगी किसी वजह से पीछे टिकवा दे जिसमें गोपालसिंह के पहुँचते ही हम लोग बात-की-बात मे उन सभी को गिरफ्तार कर लें या मार डालें।

मायारानी––मगर यह बात मुझे नापसन्द है क्योंकि एक तो उसके लिखे अनुसार फौज 'पिपलिया घाटी' तक जरूर जायेगी, अगर मान लिया जाये कि नकली रामदीन के हुक्म से फौज पीछे रह भी जाये और तुम लोग उन सभी को गिरफ्तार कर लो तो भी हमारा काम न निकल सकेगा क्योंकि राजा गोपालसिंह के पकड़े या मारे जाने की खबर