पृष्ठ:चंद्रकांता संतति भाग 4.djvu/२२१

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जिस समय इन्द्रदेव और गोपाल सिंह की मुलाकात हुई थी, चिराग जल चुका था। यद्यपि इन्दिरा ने अपना किस्सा संक्षेप में बयान किया था मगर फिर भी इस काम में डेढ़ पहर का समय बीत गया था। इसके बाद राजा गोपाल सिंह ने अपने सामने इन्द्रदेव को खिलाया और इन्द्रदेव ने अपना तथा रोहतासढ़ का हाल कहना शुरू किया तथा इस समय तक जो मामले हो चुके थे, सब खुलासा बयान किया। तमाम रात बात- चीत में ही बीत गई और सवेरा होने पर जरूरी कामों से छुट्टी पाकर तीनों आदमी तिलिस्म के अन्दर जाने के लिए तैयार हुए।

इस जगह हमें यह कह देना चाहिए कि इन्दिरा को तिलिस्म के अन्दर से निकाल कर अपने घर में ले आना राजा गोपालसिंह ने बहुत गुप्त रक्खा था और ऐयारी के ढंग पर उसकी सूरत भी बदलवा दी थी।



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आनन्दसिंह की आवाज सुनने पर इन्द्रजीतसिंह का शक जाता रहा और वे आनन्दसिंह के आने का इन्तजार करते हुए नीचे उतर आए जहाँ थोड़ी ही देर बाद उन्होंने अपने छोटे भाई को उसी राह से आते देखा जिस राह से वे स्वयं इस मकान में आये थे।

इन्द्रजीतसिंह अपने भाई के लिए बहुत ही दुःखी थे। उन्हें विश्वास हो गया था आनन्द सिंह किसी आफत में फंस गये और बिना तरवुद के उनका छूटना कठिन है, मगर थोड़ी ही देर में बिना झंझट के उनके आ मिलने से उन्हें कम ताज्जुब न हुआ। उन्होंने आनन्दसिंह को गले से लगा लिया और कहा-

इन्द्रदेव--मैं तो समझता था कि तुम किसी आफत में फस गए और तुम्हारे छुड़ाने के लिए बहुत ज्यादा तरदुद करना पड़ेगा।

आनन्दसिंह--जी नहीं, वह मामला तो बिल्कुल खेल ही निकला। सच तो यह है कि इस तिलिस्म में दिल्लगी और मसखरेपन का भाग भी मिला हुआ है।

इन्द्रदेव--तो तुम्हें किसी तरह की तकलीफ नहीं हुई?

आनन्दसिंह--कुछ भी नहीं, हवा के खिंचाव के कारण जब मैं शीशे के अन्दर चला गया तो वह शीशे का टुकड़ा जिसे दरवाजा कहना चाहिए, बन्द हो गया और मैंने अपने को पूरे अन्धकार में पाया। तिलिस्मी खंजर का कब्जा दबाकर रोशनी की, तो सामने एक छोटा-सा दरवाजा एक पल्ले का दिखाई पड़ा, जिसमें खींचने के लिए लोहे की दो कड़ियाँ लगी हुई थीं। मैंने बाएँ हाथ से एक कड़ी पकड़ कर दरवाजा खींचना चाह, मगर वह थोड़ा-सा खिचकर रह गया। सोचा कि इसमें दो कड़ियां इसीलिए लगी हैं कि दोनों हाथों से पकड़कर दरवाजा खींचा जाये। अतः तिलिस्मी खंजर म्यान में रख लिया जिससे पुनः अंधकार हो गया और इसके बाद दोनों हाथों से दोनों कड़ियों को पकड़कर अपनी तरफ खींचना चाहा, मगर मेरे दोनों हाथ उन कड़ियों में चिपक गये और दरवाजा